खामोश बरसात
बरसात में न बरसा पानी, ये क्यों है,
बादल भी सर पे मगर विरानी क्यों है।
मिट्टी ने ओढ़ रखी है प्यासों की चादर,
सोंधी-सी खुशबुओं में ये हैरानी क्यों है।
नदियों के होंठ सूखे, समंदर भी ख़ामोश,
लहरों की हर अदा सें परेशानी क्यों है।
आँखों में अश्क ठहरे, मगर बह नहीं पाए,
इस दिल की धड़कनों में निगरानी क्यों है।
महफ़िल तो आखिर उससे सजी इक ओर,
चेहरों के दरमियाँ फिर ये अनजानी क्यों है।
लोगों के पास शब्दों का अंबार बहुत हैं ,
मगर अल्फ़ाज़ में अब नादानी क्यों है।
शायद ये वक़्त हमसे कोई बात कह रहा,
हर शख़्स की हँसी में ये हैरानी क्यों है।
एक रोज़ ये घटाएँ भी खुलकर बरसेंगी,
ठहरी हुई फ़िज़ाओं में तूफ़ानी क्यों है।
ये सोच के रख ऐ दिल, उम्मीद ज़िंदा तू,
सूखे हुए मौसम में नमी की निशानी क्यों है।
— सोमेश देवांगन
