शादी का बंधन
एतवार अब टूट रहा
शादी के बंधन से
सात की क्या कहें
एक जन्म का बंधन ही भारी हो रहा
नारी को चाहिए आज़ादी
क्यों न चाहे वो आज़ादी उड़ने की
अपने पैरों पर ख़ड़ी होना उसको आ गया
बैसाखियों की अब उसे जरूरत नहीं
पुरुष की प्रतंत्रता वह क्यों सहे
पैसों की मोहताज़ नहीं
कोई बंधन अब स्वीकार नहीं
शादी जन्म जन्म का बंधन है
उसमें उसको अब बंधना स्वीकर नहीं
