सामाजिक

अचानक बंद होते ई रिक्शा

हाल के दिनों में ई रिक्शा से जुड़ी एक ऐसी घटना सामने आई जिसने तकनीक, सड़क सुरक्षा और साइबर सुरक्षा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कुछ लोग मोबाइल फोन पर एक ऐप का उपयोग करके चलते हुए ई रिक्शों को अचानक रोकते दिखाई दिए। पहले इसे सामान्य शरारत या इंटरनेट पर लोकप्रिय होने की कोशिश माना गया, लेकिन जैसे जैसे अधिक वीडियो सामने आए और चालकों की शिकायतें बढ़ीं, मामला प्रशासन और सरकार के संज्ञान में पहुंच गया। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार BAT BMS नामक एक मोबाइल ऐप, जो मूल रूप से ब्लूटूथ आधारित लिथियम बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम की निगरानी के लिए बनाया गया था, उसका दुरुपयोग कुछ लोगों द्वारा किया जा रहा था। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि डिजिटल सुविधाओं से लैस आधुनिक वाहन केवल यांत्रिक प्रणाली नहीं रह गए हैं बल्कि वे साइबर सुरक्षा से भी सीधे जुड़े हुए हैं।

भारत में ई रिक्शा लाखों लोगों की आजीविका का साधन हैं। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक ये सस्ती, सुविधाजनक और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन सेवा प्रदान करते हैं। हजारों परिवारों की रोजी रोटी इन वाहनों पर निर्भर है। ऐसे में यदि कोई तकनीकी कमजोरी इन वाहनों को अचानक बीच सड़क पर रोक सकती है तो यह केवल चालक की परेशानी नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का भी गंभीर प्रश्न बन जाता है। किसी व्यस्त चौराहे, फ्लाईओवर या बाजार में अचानक रुक जाने वाला वाहन दुर्घटना का कारण बन सकता है। यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और चालक की दैनिक आय भी प्रभावित होती है।

BAT BMS जैसे ऐप का मूल उद्देश्य बैटरी की स्थिति पर नजर रखना है। आधुनिक लिथियम आयन बैटरियों में बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम लगाया जाता है जो बैटरी के तापमान, वोल्टेज, चार्ज और डिस्चार्ज जैसी जानकारियों की निगरानी करता है। कई कंपनियां सुविधा के लिए इन प्रणालियों में ब्लूटूथ कनेक्टिविटी भी देती हैं ताकि मोबाइल फोन के माध्यम से उपयोगकर्ता बैटरी की जानकारी देख सके। सामान्य परिस्थितियों में यह एक उपयोगी सुविधा है क्योंकि इससे बैटरी की स्थिति का पता चलता रहता है और रखरखाव आसान हो जाता है। लेकिन यदि इस कनेक्टिविटी में पर्याप्त सुरक्षा न हो तो वही सुविधा जोखिम में बदल सकती है।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि वायरल घटनाओं में सभी ई रिक्शा प्रभावित नहीं हुए बल्कि केवल वे वाहन प्रभावित होने की संभावना रखते हैं जिनमें विशेष प्रकार का ब्लूटूथ आधारित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम लगा था। रिपोर्टों के अनुसार यह ऐप इंटरनेट के माध्यम से दूर बैठे व्यक्ति द्वारा पूरे शहर के वाहन बंद नहीं करता, बल्कि सीमित ब्लूटूथ दूरी के भीतर उपलब्ध असुरक्षित बैटरियों से जुड़ सकता है। यदि किसी बैटरी में मजबूत प्रमाणीकरण या पासवर्ड सुरक्षा नहीं है तो अनधिकृत व्यक्ति उससे कनेक्ट होकर कुछ नियंत्रण संबंधी कमांड भेज सकता है। इसका अर्थ यह है कि समस्या का केंद्र कमजोर साइबर सुरक्षा है, न कि कोई रहस्यमय दूरस्थ हैकिंग।

सोशल मीडिया ने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। कुछ लोगों ने इसे मनोरंजन का साधन समझकर वीडियो बनाए और साझा किए। लेकिन ऐसे वीडियो देखते ही देखते हजारों लोगों तक पहुंच गए और कई युवाओं ने इसे दोहराने की कोशिश की। इंटरनेट पर लोकप्रियता पाने की होड़ में यह भूल गया कि जिस वाहन को रोका जा रहा है उसके भीतर यात्री बैठे हैं और चालक की आजीविका उससे जुड़ी है। सड़क पर चलती गाड़ी को अचानक रोक देना किसी मजाक की श्रेणी में नहीं आता बल्कि इससे गंभीर दुर्घटना भी हो सकती है। इसी कारण पुलिस और प्रशासन ने ऐसी गतिविधियों को कानून के दायरे में लाने की चेतावनी दी है।

इस विवाद के सामने आने के बाद सरकार ने भी तेजी से कदम उठाए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार संबंधित ऐप और उससे जुड़े कुछ अन्य माध्यमों पर कार्रवाई की गई तथा जांच शुरू की गई कि वास्तव में यह ऐप किन परिस्थितियों में वाहनों को प्रभावित कर सकता है। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि कहीं कमजोर सुरक्षा वाले बैटरी प्रबंधन सिस्टम या बिना प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल तो इस समस्या की जड़ नहीं हैं। सरकार का उद्देश्य केवल एक ऐप पर कार्रवाई करना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि भविष्य में ऐसी कमजोरियां दोबारा सामने न आएं।

यह घटना भारत में तेजी से बढ़ रहे कनेक्टेड वाहनों की दुनिया के लिए भी चेतावनी है। आज केवल ई रिक्शा ही नहीं बल्कि कार, बस, ट्रक और दोपहिया वाहन भी डिजिटल तकनीक से लैस होते जा रहे हैं। इनमें जीपीएस, मोबाइल ऐप, वायरलेस अपडेट और क्लाउड आधारित सेवाओं का उपयोग बढ़ रहा है। जितनी अधिक डिजिटल सुविधाएं बढ़ेंगी, उतना ही साइबर सुरक्षा का महत्व भी बढ़ेगा। यदि सुरक्षा को प्रारंभिक डिजाइन का हिस्सा नहीं बनाया गया तो भविष्य में इसी प्रकार की घटनाएं अन्य वाहनों में भी देखने को मिल सकती हैं।

निर्माताओं की जिम्मेदारी इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण है। किसी भी स्मार्ट बैटरी या वाहन नियंत्रण प्रणाली को डिजाइन करते समय केवल सुविधा पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। मजबूत पासवर्ड, एन्क्रिप्शन, सुरक्षित ब्लूटूथ पेयरिंग, डिजिटल प्रमाणन और नियमित फर्मवेयर अपडेट जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य होनी चाहिए। यदि कोई सिस्टम बिना पहचान सत्यापन के किसी भी मोबाइल फोन से जुड़ जाता है तो वह शुरुआत से ही जोखिम में है। आधुनिक साइबर सुरक्षा का मूल सिद्धांत यही है कि किसी भी उपकरण तक पहुंच केवल अधिकृत उपयोगकर्ता को मिले।

सर्विस सेंटरों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कई बार स्थानीय स्तर पर सस्ते या बिना प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक मॉड्यूल लगा दिए जाते हैं ताकि लागत कम रहे। लेकिन ऐसे उपकरणों में सुरक्षा मानकों का अभाव हो सकता है। यदि बैटरी बदली जा रही है या नया कंट्रोलर लगाया जा रहा है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वह प्रमाणित निर्माता का हो और उसमें आवश्यक सुरक्षा सुविधाएं उपलब्ध हों। तकनीशियनों को भी यह प्रशिक्षण मिलना चाहिए कि वे केवल यांत्रिक खराबी ही नहीं बल्कि साइबर सुरक्षा संबंधी समस्याओं की भी पहचान कर सकें।

चालकों और वाहन मालिकों को भी जागरूक होना होगा। यदि वाहन में मोबाइल ऐप के माध्यम से कनेक्टिविटी उपलब्ध है तो उसका डिफॉल्ट पासवर्ड बदलना चाहिए। अनजान लोगों को ब्लूटूथ पेयरिंग की अनुमति नहीं देनी चाहिए। यदि निर्माता कोई सुरक्षा अपडेट जारी करे तो उसे समय पर स्थापित करना चाहिए। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की स्थिति में अधिकृत सर्विस सेंटर से जांच करानी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर पुलिस या साइबर सेल को सूचना देनी चाहिए। डिजिटल सुरक्षा अब केवल कंप्यूटर उपयोगकर्ताओं की जिम्मेदारी नहीं रही बल्कि वाहन मालिकों की भी जिम्मेदारी बन चुकी है।

नीतिगत स्तर पर भी कई सुधारों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। भारत में ई रिक्शा और अन्य छोटे इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसलिए उनके लिए न्यूनतम साइबर सुरक्षा मानक निर्धारित किए जाने चाहिए। जिस प्रकार ब्रेक, लाइट और अन्य यांत्रिक उपकरणों के लिए सुरक्षा मानक होते हैं, उसी प्रकार डिजिटल नियंत्रण प्रणाली और वायरलेस मॉड्यूल के लिए भी अनिवार्य मानक होने चाहिए। प्रमाणित परीक्षण के बाद ही ऐसे उपकरणों को बाजार में बिक्री की अनुमति दी जानी चाहिए।

इस घटना का आर्थिक प्रभाव भी कम नहीं है। यदि चालकों का भरोसा आधुनिक तकनीक से उठने लगेगा तो वे नई बैटरियों या स्मार्ट प्रणालियों को अपनाने से हिचकेंगे। इससे इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग की प्रगति प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर यदि कंपनियां बेहतर सुरक्षा उपलब्ध कराती हैं तो शुरुआती लागत कुछ बढ़ सकती है, लेकिन इससे उपभोक्ताओं का विश्वास मजबूत होगा और लंबे समय में उद्योग को ही लाभ मिलेगा। सुरक्षित तकनीक हमेशा टिकाऊ बाजार का आधार बनती है।

मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी तकनीकी घटना की रिपोर्टिंग तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। बिना पुष्टि के यह कहना कि सभी ई रिक्शा इंटरनेट के माध्यम से कहीं से भी बंद किए जा सकते हैं, अनावश्यक भय पैदा कर सकता है। वहीं वास्तविक सुरक्षा जोखिमों को छिपाना भी उचित नहीं होगा। संतुलित और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग से ही जनता सही जानकारी प्राप्त कर सकती है और अफवाहों पर रोक लग सकती है।

इस पूरे प्रकरण से एक व्यापक संदेश भी निकलता है। डिजिटल युग में किसी भी नई सुविधा के साथ नई जिम्मेदारियां भी आती हैं। पहले वाहन की सुरक्षा का अर्थ केवल मजबूत इंजन, अच्छे ब्रेक और सुरक्षित ढांचा होता था। अब उसमें सुरक्षित सॉफ्टवेयर, सुरक्षित संचार प्रणाली और सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण भी शामिल हो चुके हैं। भविष्य के वाहन केवल मशीन नहीं होंगे बल्कि चलते फिरते डिजिटल उपकरण भी होंगे। इसलिए साइबर सुरक्षा अब वैकल्पिक विषय नहीं बल्कि सड़क सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।

BAT BMS विवाद ने यह दिखा दिया कि तकनीक का गलत उपयोग कितनी तेजी से सामाजिक समस्या बन सकता है। एक ऐसा ऐप जिसे बैटरी की निगरानी के लिए बनाया गया था, उसके कथित दुरुपयोग ने हजारों चालकों की चिंता बढ़ा दी। हालांकि अभी भी प्रत्येक घटना की तकनीकी जांच आवश्यक है और सभी मामलों को एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा, फिर भी यह स्पष्ट है कि कमजोर सुरक्षा वाले डिजिटल उपकरण सार्वजनिक जोखिम पैदा कर सकते हैं।

अंततः यह घटना केवल एक ऐप या एक कंपनी तक सीमित नहीं है। यह पूरे डिजिटल परिवहन तंत्र के लिए चेतावनी है कि सुविधा और सुरक्षा दोनों को साथ लेकर चलना होगा। यदि निर्माता मजबूत सुरक्षा अपनाएं, सरकार स्पष्ट मानक बनाए, तकनीशियन प्रमाणित उपकरणों का उपयोग करें, चालक डिजिटल सावधानी बरतें और कानून का प्रभावी पालन हो, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। भारत तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रहा है और यह आवश्यक है कि यह यात्रा केवल हरित ऊर्जा की नहीं बल्कि सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल तकनीक की भी हो। तभी ई रिक्शा वास्तव में आम नागरिक के लिए सुरक्षित, विश्वसनीय और भविष्य उन्मुख परिवहन का माध्यम बन सकेंगे।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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