कहानी

कहानी – इंसानियत

गांव के बाहरी छोर पर बने उस पुराने घर में कभी बहुत रौनक हुआ करती थी। घर के आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, रसोई से उठती खुशबू पूरे मोहल्ले को अपनी ओर खींच लेती थी और शाम को परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर दिनभर की बातें किया करते थे। उस घर की बड़ी बहू सविता अपने स्वभाव, मेहनत और मधुर व्यवहार के कारण पूरे परिवार की प्रिय थी। उसके पति राजेश गांव के स्कूल में अध्यापक थे और सभी उनका बहुत सम्मान करते थे।

लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। एक बरसाती शाम राजेश शहर से लौट रहे थे कि रास्ते में हुए एक सड़क हादसे ने सब कुछ बदल दिया। खबर जब गांव पहुंची तो पूरे परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। सविता की दुनिया एक ही पल में उजड़ गई। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, भविष्य की चिंता और पति को खोने का दुख, सब कुछ एक साथ उसके कंधों पर आ गिरा।

शुरू के कुछ दिनों तक लोग संवेदना व्यक्त करने आते रहे। लेकिन समय बीतते ही वही लोग धीरे-धीरे बदलने लगे। गांव में फुसफुसाहटें शुरू हो गईं। कुछ लोग कहते, “अब इसका क्या होगा?” कुछ कहते, “विधवा औरत की जिंदगी तो बस बच्चों को पालने में निकल जाती है।” कुछ लोग तो यहां तक कह देते कि अब उसे अपने सपनों और इच्छाओं के बारे में सोचना ही छोड़ देना चाहिए।

सविता हर ताना चुपचाप सुन लेती। वह जानती थी कि समाज का मुंह बंद नहीं किया जा सकता। लेकिन सबसे अधिक पीड़ा उसे तब होती जब कुछ रिश्तेदार भी उससे दूरी बनाने लगे। जिन लोगों ने कभी उसे बेटी जैसा प्यार दिया था, वे अब उसे बोझ की तरह देखने लगे थे।

इसी परिवार में राजेश का छोटा भाई अमन भी रहता था। उम्र में सविता से छोटा होने के बावजूद वह उसे हमेशा बड़ी बहन जैसा सम्मान देता था। राजेश के जाने के बाद उसने देखा कि उसकी भाभी भीतर ही भीतर टूट रही हैं। वह समझ गया कि इस समय उन्हें दया नहीं, बल्कि सम्मान और सहारे की जरूरत है।

एक दिन उसने सविता से कहा, “भाभी, जिंदगी यहीं खत्म नहीं हुई है। भैया हमेशा चाहते थे कि आप आगे बढ़ें। आपको बच्चों के लिए और अपने लिए मजबूत बनना होगा।”

सविता ने उदास होकर कहा, “अब मेरे लिए क्या बचा है अमन? लोग तो मुझे देखकर तरह-तरह की बातें करते हैं।”

अमन मुस्कराया और बोला, “लोगों का काम बातें करना है। अगर हम उनकी सुनते रहेंगे तो कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे।”

उस दिन के बाद अमन ने एक फैसला किया। वह हर कदम पर अपनी भाभी का साथ देगा। उसने घर के कामों में मदद करनी शुरू कर दी। बच्चों की पढ़ाई का ध्यान रखने लगा। जब भी कोई रिश्तेदार या पड़ोसी सविता के बारे में अनुचित बातें करता, वह विनम्रता से लेकिन दृढ़ता के साथ उनका जवाब देता।

धीरे-धीरे अमन को एक बात समझ आने लगी। सविता पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। शादी से पहले उसका सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन परिस्थितियों और जिम्मेदारियों के कारण वह सपना अधूरा रह गया था।

एक दिन अमन ने पूछा, “भाभी, अगर आपको मौका मिले तो क्या आप फिर पढ़ाई करना चाहेंगी?”

सविता ने हैरानी से उसकी ओर देखा। वर्षों बाद किसी ने उसके सपनों के बारे में पूछा था।

“अब इस उम्र में?” उसने संकोच से कहा।

“उम्र सपनों को नहीं रोकती,” अमन ने जवाब दिया।

उस रात सविता बहुत देर तक सो नहीं सकी। उसके मन में पुराने सपने जाग उठे। लेकिन अगले ही पल उसे समाज की बातें याद आ गईं। लोग क्या कहेंगे? बच्चे कैसे संभलेंगे? खर्च कहां से आएगा?

अमन ने उसकी सारी चिंताओं को समझ लिया। उसने कहा, “आप बस पढ़ाई शुरू कीजिए। बाकी जिम्मेदारियां हम मिलकर संभाल लेंगे।”

शुरुआत आसान नहीं थी। दिनभर घर और बच्चों की जिम्मेदारी निभाने के बाद रात में पढ़ाई करना बेहद कठिन था। कई बार थकान इतनी होती कि किताब हाथ में लिए-लिए ही आंख लग जाती। लेकिन हर बार अमन उसे हिम्मत देता।

गांव के लोग फिर बातें करने लगे।

“देखो, अब डॉक्टर बनने चली है।”

“इस उम्र में पढ़ाई करेगी?”

“घर संभाले या किताबें पढ़े?”

सविता पहले इन बातों से परेशान हो जाती थी, लेकिन अब उसके भीतर एक नया आत्मविश्वास जन्म लेने लगा था। उसे पता था कि कुछ लोग उसके असफल होने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो उसकी सफलता की उम्मीद कर रहे हैं।

वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। कई बार आर्थिक परेशानियां सामने आईं। फीस भरने के लिए घर की कुछ चीजें बेचनी पड़ीं। कई त्योहार बिना नए कपड़ों के गुजर गए। लेकिन अमन और सविता ने हार नहीं मानी।

बच्चे भी धीरे-धीरे समझदार हो गए थे। वे अपनी मां को पढ़ते देखकर गर्व महसूस करते थे। जब सविता देर रात तक पढ़ती, तो उसकी बेटी चुपचाप उसके लिए चाय बना लाती। बेटा अपनी कॉपियां लेकर उसके पास बैठ जाता ताकि मां को अकेलापन महसूस न हो।

समय अपनी गति से चलता रहा। मेहनत के बीज धीरे-धीरे फल देने लगे। सविता ने परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त किए। फिर उसे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया।

जिस दिन यह खबर आई, उस दिन अमन की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसने कहा, “भाभी, यह तो बस शुरुआत है।”

कॉलेज का जीवन भी चुनौतियों से भरा था। वहां अधिकतर छात्र उससे उम्र में छोटे थे। कई बार उसे असहज महसूस होता। लेकिन उसने अपने लक्ष्य से नजर नहीं हटाई।

हर कठिन दिन के बाद उसे अपने बच्चों का चेहरा याद आता। उसे अमन का विश्वास याद आता। और फिर वह दोबारा पूरी ताकत से जुट जाती।

साल दर साल बीतते गए। आखिर वह दिन भी आया जिसका इंतजार पूरे परिवार को था। सविता ने अपनी मेडिकल शिक्षा पूरी कर ली थी।

दीक्षांत समारोह में जब उसका नाम पुकारा गया और उसे डॉक्टर की उपाधि दी गई, तो सभागार तालियों से गूंज उठा। मंच से नीचे बैठे उसके बच्चे खुशी से रो रहे थे। अमन की आंखें भी नम थीं।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सविता सबसे पहले अमन के पास आई। उसने कहा, “आज अगर मैं यहां तक पहुंची हूं तो इसकी सबसे बड़ी वजह तुम हो।”

अमन ने मुस्कराकर कहा, “नहीं भाभी, मैंने सिर्फ आपका साथ दिया है। रास्ता आपने खुद तय किया है।”

कुछ वर्षों बाद सविता ने अपने क्षेत्र में एक छोटा अस्पताल खोला। वहां गरीब मरीजों का कम खर्च में इलाज किया जाता था। गांव और आसपास के लोग अब उसे सम्मान की नजर से देखते थे।

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वही लोग, जो कभी उसके सपनों का मजाक उड़ाते थे, अब उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे।

लेकिन सविता के मन में किसी के लिए कोई कटुता नहीं थी। संघर्ष ने उसे मजबूत बनाया था, कठोर नहीं।

एक दिन अस्पताल में एक बुजुर्ग महिला इलाज कराने आई। बातचीत के दौरान उसने कहा, “बेटी, तुम्हारी कहानी सुनकर लगता है कि भगवान अच्छे लोगों की मदद जरूर करता है।”

सविता मुस्कराई और बोली, “भगवान मदद करता है, लेकिन अक्सर किसी इंसान के रूप में। मेरी जिंदगी में वह मदद मेरे परिवार और मेरे देवर के रूप में आई थी।”

उस शाम अस्पताल से लौटते समय उसने आसमान की ओर देखा। उसे अपने दिवंगत पति की याद आई। उसे लगा जैसे कहीं न कहीं वे भी उसकी इस सफलता को देखकर मुस्करा रहे होंगे।

घर पहुंचकर उसने आंगन में खेलते बच्चों को देखा। कभी यही बच्चे उसके संघर्ष का कारण थे और यही उसकी ताकत भी बने। उसने महसूस किया कि जीवन की सबसे बड़ी जीत केवल मंजिल तक पहुंचना नहीं है, बल्कि रास्ते में अपने मानवीय मूल्यों को बचाए रखना है।

अमन आज भी पहले की तरह विनम्र था। उसने कभी अपने योगदान का श्रेय नहीं लिया। लेकिन सविता जानती थी कि अगर उस कठिन समय में उसने उसका हाथ न थामा होता, तो शायद उसकी जिंदगी बिल्कुल अलग होती।

उसने सीखा था कि रिश्ते केवल खून के नहीं होते। कई बार सम्मान, भरोसा और इंसानियत ऐसे बंधन बना देते हैं जो जन्म से मिले रिश्तों से भी अधिक मजबूत साबित होते हैं।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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