ग़ज़ल
दर्द है ‘हल्का-सा’ मगर हो रहा है,
दिल किसी याद में बिखर रहा है।
ये रात चुप है, चाँद भी खामोश है,
आँख का ख़्वाब पत्थर हो रहा है।
यूं तो वक्त की ठंडी हवाएँ कह गईं,
हर सफ़र अब मुश्किल हो रहा है।
तेरी आवाज की मीठी-सी गूँज से,
ये घर का कोना मुनव्वर हो रहा है।
कुछ ‘दुआएँ’ साथ चलती हैं अभी,
वरन जीना भी तो दुश्वार हो रहा है।
अभी लोग कहते हैं सभी अच्छा है,
मन मगर अंदर ही अंदर ‘रो’ रहा है।
इस दर्द को हँसकर छुपाने की अदा,
आदमी को और बेहतर कर रही है।
हाँ, दर्द है हल्का-सा मगर हो रहा है,
यूं दिल किसी याद में बिखर रहा है।
— संजय एम तराणेकर
