कविता

जब कुछ टूट जाता है

जब कुछ टूट जाता है ..
पीछे छूट जाता है
फिर सब पहले जैसा नहीं रहता
एक दरार रह जाती हैं
जो भर भी जाती है
तो रिसना नहीं भूलती ।
एक गांठ रह जाता है
जो खुल जाता है पर
उसकी सिलवटें नहीं मिटती ।
रिश्ते मे गर्माहट नहीं रहती
संकोच रह जाता है
घाव तो फिर भी भर जातें है
भावों में मोच पड़ जाता है।।

— साधना सिंह

साधना सिंह

मै साधना सिंह, युपी के एक शहर गोरखपुर से हु । लिखने का शौक कॉलेज से ही था । मै किसी भी विधा से अनभिज्ञ हु बस अपने एहसास कागज पर उतार देती हु । कुछ पंक्तियो मे - छंदमुक्त हो या छंदबध मुझे क्या पता ये पंक्तिया बस एहसास है तुम्हारे होने का तुम्हे खोने का कोई एहसास जब जेहन मे संवरता है वही शब्द बन कर कागज पर निखरता है । धन्यवाद :)

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