हास्य व्यंग्य

हामिद का चिट्टा (व्यंग्य)

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट
अंतकाल पछताएगा, जब प्राण जाएँगे छूट।
मौका है नेता जी आप भी वैतरणी पार कर लीजिए। बड़ी प्रतीक्षा के बाद शुभ घड़ी आयी है। न जाने कौन सी हिचकी आखरी हो?
पंचायत के सामने भीड़ लग रही है। अलगू चौधरी और जुम्मन मियाँ दोनों की पौ बारह है। ना जाने किसका सिक्का जम जाए? बरसों से परेशान थे बेचारे! कमबख्त ऊँट पहाड़ के पास आ ही नहीं रहा था! हामिद मियाँ चिमटा पकड़े अपने बालक मंदिर के दोस्तों के साथ आँसू बहा रहे थे कि दुकानदार ने तीन पैसे भी ले लिए और चिट्टा भी टूटा हुआ थमा दिया। बेशक हामिद के साथ बुरा हुआ। बेचारा गरीब दादी का होनहार भविष्य! ईदगाह को ताक पर रखकर दादी की सेवा के जुगाड़ में लगा रहा। अब जब फैसले की घड़ी आ रही थी तो अलगू और जुम्मन दद्दू भाँजी मारने आ गये।
बेचारा हामिद नहीं जानता ना कि लोकतंत्र और राजनीति किसे कहते हैं? उसे नमाज़ पढ़ते रहना चाहिए था- ईदगाह में।

— शरद सुनेरी

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