बीज का स्वप्न
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
स्वर्णिम मन में ख्वाब लिए तब, लेता आंखें मीच।
नया परिवेश कैसा होगा, सुख या दुख की खान।
नये सपनों का आंगन मेरा, होगी नई उड़ान।
संस्कार होंगे उत्तम या तो, भाव मिलें मन नीच।
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
अमृत मिलेगा है पीने को, या तो विष का पान।
शोहरत मिले जीवन को या,नफरत अरु अपमान।
मिले स्वर्ग सा सुखी रहूॅं या, वैर द्वेष का कीच।
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
अरे आदमी जन्म बीज सा, बन मानव संतान।
जैसी संगत बैठेगा तो, फल वैसा ही जान।
देख कुसंगत पल्ला छोड़ो, मत रहो नैन मींच।
बीज का स्वप्न ले प्रारब्ध को, फूटे महि के बीच।
— शिव सन्याल
