आधुनिक दरबार का तमाशा
चारों तरफ धुआँ उठा है,
तुम सिंहासन पर आँख मूँदे बैठे हो,
राजकोष खाली पड़ा है,
पर चेहरे पर शाही नूर ओढ़े बैठे हो,
रंगमंच का वो मूक अभिनेता भी,
तुमसे ज़्यादा समझदार निकला,
तुम जलते हुए शहर में भी,
जीत का जश्न साधे बैठे हो,
शुक्र मनाओ इस बहरे दौर का,
जिसने तुम्हें ‘प्रधान’ किया,
वरना जनता के तीखे सवालों ने,
कब का बेनकाब कर दिया होता,
भूख की लंबी कतारों को,
अब तुम ‘अनुशासन की परेड’ बताते हो,
खाली पेट राष्ट्रवाद का राग फूंककर,
तुम उत्सव मनाते हो,
आईटी सेल के चारण-भाटों ने,
तुम्हें एक ही मन्त्र सिखाया है,
“साहेब अमर हैं”,
चाहे देश ने अपना सब कुछ गँवाया है,
बेरोजगारी का ज्वर बढ़ा है?
तो आंकड़ों से उसे डराओ तुम,
संविधान की साँसें कम हैं?
तो विज्ञापनों का ठहाका लगाओ तुम,
नेताओं के चुनावी जुमलों पर,
अब ताली बजाना मज़बूरी है,
अधिकारों के इस कत्ल पर,
मौन रहना देशहित में जरूरी है,
सच्चाई बयां करना पाप है साहब,
ये नया निज़ाम कहता है,
जो रोया वो ‘द्रोही’ ठहरा,
जो जयकारे लगाए वो मज़े में रहता है,
चलो उठाओ अपनी मीडिया,
नया नैरेटिव चमकाओ तुम,
जन्नत भले ही मलबे में बदले,
भव्य तस्वीरें दिखाओ तुम।
इस तानाशाही दौर का देखो,
एक ही सीधा इलाज है,
आँख-कान और मुँह बंद रखो,
इसी में सुरक्षित ताज़ है!
— राजेन्द्र लाहिरी
