गीत/नवगीत

नैनों में अश्रु

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।
मन ही मन जिसे वरा था,
ना हुआ वो हमसफ़र।।

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।।

सिक्के नदियों में उछाले,
बाँधे मन्नत के बंधन।
मंदिर-मंदिर शीश झुकाए,
छुए नित प्रभु के चरण।

हँस रहे मुझ पर ही जैसे,
ये चूड़ियाँ और ये कंगन।
इतनी पूजा और अर्चन का,
क्या मिला मुझको प्रतिफल?

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।।

मन से चाहा, मन से पूजा,
संग देखे थे कई सपने।
चंद पलों में सदियाँ जी लीं,
अब छलक रहे केवल नयन।

अब कैसे रास आएँ,
ये हल्दी और ये उबटन।
लगता है अब मुझको जैसे,
डस रहा मेरा यह तन।

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।।

मन ही मन कर दिए थे अर्पण,
तुझ पर अपना तन और मन।
माँग मेरी तुम ही भरोगे,
हमने खाई थी यह कसम।

उस प्रेम का मेरे मन पर,
चढ़ा हुआ है आवरण।
अब अलग राहों पर देखो,
बढ़ गए हैं ये कदम।

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।।

सारी यादों को संजोकर,
पग पड़े दूजे आँगन।
आ गया अब वह भी पल,
जो जीना था तेरे ही संग।

अपने दिल की इस व्यथा का,
क्या करे कोई वर्णन।
वही समझे इस घड़ी को,
जिस पर यह गुज़रा हो क्षण

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।
मन ही मन जिसे वरा था,
ना हुआ वो हमसफ़र।।

हाथों की मेहंदी वो देखे,
नैनों में अश्रु भरकर।।

— सविता सिंह ‘मीरा’

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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