अंजूरी भर धूप
अब जब तुम आए,
तब तक मेरे
आँगन में चाँद उतर चुका था,
दीप बुझ चुके थे,और मैं
अपनी हथेलियों का
सारा उजाला
रात को दे चुकी थी।
तुम्हारे आने तक एक लंबी रात
मेरे भीतर ठहर चुकी थी,
कुछ सपने नींद की देहरी पर
दम तोड़ चुके थे,
कुछ उम्मीदें
खामोशी ओढ़ सो चुकी थीं।
इसलिए
तुम्हें पुकारा नहीं,
न कोई शिकायत की
बस अपनी हथेली में
थोड़ी-सी सुनहरी धूप समेटी
और चल पड़ी!
उस ओर,
जहाँ दूर क्षितिज पर
अवनी और अंबर
मिलते हुए-से प्रतीत होते हैं।
शायद वहीं
मेरी प्रतीक्षा का
अंत होगा,
शायद वहीं
मेरे हिस्से की
वह रोशनी मिलेगी
जिसे मैं
किसी के आने तक
बचाकर नहीं रखूँगी।
अब मैं
रात को अपना उजाला नहीं दूँगी,
न बुझ चुके दीपों का
हिसाब रखूँगी।
बस
अंजूरी भर धूप लेकर
अपने ही रास्ते पर चलूँगी,
जहाँ साँझ भी मिले
तो उसे
सवेरा समझकर जी लूँगी।
— सविता सिंह मीरा
