मुक्तक/दोहा

कलम सिर्फ लिखती नहीं

कलम उठी तो दर्द ने, खोले अपने द्वार।
मन में दबे सवाल सब, बनकर निकले प्यार॥

स्याही केवल स्याह है, भीतर गहरा घाव।
शब्द-शब्द में बोलता, मन का अपना भाव॥

होंठों पर जो रुक गया, कागज़ कहता बात।
मौन हृदय की पीर को, मिल जाती सौगात॥

दिल को पहल कुरेदती, फिर लिखती इतिहास।
हर अक्षर में छिप रहा, टूटा-सा एहसास॥

कागज़ मेरा मित्र है, कलम बनी हमराज।
मन की सभी व्यथा कहे, बिन बोले हर राज॥

दर्द लिखूँ तो आँख में, उतर पड़े कुछ नीर।
मेरी पीड़ा जानता, कागज़ ही गंभीर॥

जो जग से ना कह सकी, कह देती है लेख।
मन का बोझ उतारकर, हल्का करता देख॥

कलम नहीं बस लेखनी, अंतर की आवाज़।
शब्दों में ढलता रहा, जीवन का अंदाज़॥

जितना मन पर भार था, उतनी करती खोज।
टूटी-बिखरी भावना, कविता बनती रोज॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh