लघुकथा

कहानी — “दूसरा कप”

बारिश की शाम थी। शहर के एक छोटे से कैफ़े में हर रोज़ ठीक पाँच बजे एक बुज़ुर्ग आते थे।
वो हमेशा कहते, “बेटा, दो कप चाय देना।” वेटर दो कप रख देता। एक कप वो धीरे-धीरे पीते। दूसरा कप सामने वाली खाली कुर्सी पर रखा रहता। कोई उसे छूता नहीं। लोग मुस्कुराते। कुछ दया से देखते। कुछ कहते, “बेचारे… शायद किसी का इंतज़ार करते हैं।” यह सिलसिला वर्षों से चल रहा था।
एक दिन नया वेटर आया। उसने हिम्मत करके पूछ लिया, “बाबा, दूसरा कप किसके लिए होता है?” बुज़ुर्ग मुस्कुराए, “मेरी पत्नी के लिए।” वेटर चुप हो गया।
“क्या… वो अब इस दुनिया में नहीं हैं?”
बुज़ुर्ग ने सिर हिलाया, “पाँच साल हो गए।”
अगले दिन भी दो कप आए। उसके अगले दिन भी। फिर अचानक… एक दिन उन्होंने सिर्फ़ एक कप चाय मँगाई। पूरा कैफ़े हैरान था।
वेटर ने सोचा, “शायद अब उन्होंने सच स्वीकार कर लिया।”
चाय रखते हुए उसने धीरे से कहा, “अच्छा लगा बाबा… आपने ख़ुद को संभाल लिया।”
बुज़ुर्ग हल्के से हँसे। बोले,“नहीं बेटा… बात वैसी नहीं है।”
“फिर?”
उन्होंने खिड़की से गिरती बारिश को देखा और कहा— “डॉक्टर ने मुझे चाय पीने से मना कर दिया है।”
वेटर ने आश्चर्य से पूछा, “तो फिर यह एक कप…?” बुज़ुर्ग की आँखें मुस्कुराईं।
उन्होंने सामने वाली खाली कुर्सी की ओर देखा और बोले— “यह उसी के लिए है… मैं तो बस उसके साथ बैठने आता हूँ।”
बारिश अब भी हो रही थी। लेकिन उस दिन कैफ़े में बैठे लोगों ने पहली बार जाना… कुछ रिश्ते साथ रहने से नहीं, साथ निभाने से ज़िंदा रहते हैं। और प्रेम… कभी-कभी एक खाली कुर्सी और एक ठंडी होती चाय में भी साँस लेता है।
कुछ लोग चले जाते हैं, पर अपनी जगह खाली नहीं करते। हम हर रोज़ उनके हिस्से की एक चाय,
एक मुस्कान, एक बात बचाकर रखते हैं। दुनिया कहती है—कुर्सी खाली है। दिल कहता है—नहीं… बस तुम्हारी आँखें वहाँ तक नहीं पहुँचतीं।

— डॉली अग्रवाल

डॉली अग्रवाल

पता - गुड़गांव ईमेल - dollyaggarwal76@gmail. com

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