कविता

बेवकूफ

मैं उनसे पुछता हूँ
जो अपराध करते हैं
किसी को बेवजह
अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके
अपनी उच्चता दिखाते हैं
ये तुम्हारी रौनक
तुम्हारी यह बोली
तुम्हारी सल्तनतें
तुम्हें पता नहीं
एक दिन तुम भी
नहीं बचा पाओगे
तुम्हारे इस शहंशाही पर
किसी और की
नजर है तिरछी
एक दिन इस दुनिया से
तेरी पारी खत्म होने जा रही है
बेवकूफ!

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com