कविता

विश्वात्मा

बॉंधे जाते हैं मन्नतों के धागे,
इस आस में रुका सौभाग्य जागे,
करुण प्रार्थनाएं परमेश्वर सुन ले,
लाखों की भीड़ में हमें बस वो चुन लें ।

तकनीकी रास्ते बंद जहॉं हो जाते,
याचक मुराद ले प्रभु के द्वार भागते,
अपराधों की क्षमा याचना कर प्रभु से,
होते हल्के चिंताओं के पहाड़ से ।

पीपल नीम कभी वट को सूत बॉंधतें,
गहरा विश्वास जगा मन्नतें मॉंगतें,
अशांत मन ताकि थोड़ा सुकून पा सके,
अतृप्त इच्छाशक्ति सजग हो जाग सके ।

तजकर अवसाद नया संबंध जोड़ते,
आस की दीप्ति से संशय बॉंध तोड़ते,
रमें कोशिशों में ये धागा बस दमकें,
फरियाद शीघ्र फलीभूत होकर चमकें ।

ये अटल विश्वास पुष्पित करता फल को,
धागा ये खुशियों से भर देता कल को,
रूकावट मन की है हम यह जानें तो,
“आनंद” यहीं है भीतर पहचानें तो ।

अनंत भंडार यहॉं लगती कमी हमें,
खोजते चाहतों को हम इसमें उसमें,
गहरा हो जब रिश्ता अंतर्रात्मा से,
अंकुरित तेज होता है विश्वात्मा से ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

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