राजनीति

पत्रकार कौन है और प्रचारक कौन?

आज के दौर में यह पहचानना पहले से कहीं अधिक कठिन होता जा रहा है कि पत्रकार कौन है और प्रचारक कौन। समाचार माध्यमों की संख्या बढ़ी है, सूचना के स्रोत बढ़े हैं और सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है। लेकिन इसी विस्तार के बीच पत्रकारिता की मूल भूमिका को लेकर एक गंभीर प्रश्न खड़ा हुआ है—क्या पत्रकारिता अभी भी सत्ता से सवाल करने का माध्यम है, या वह राजनीतिक और वैचारिक खेमेबंदी का हिस्सा बनती जा रही है? यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति, संस्था, चैनल या विचारधारा तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में पत्रकारिता की विश्वसनीयता का प्रश्न इससे कहीं व्यापक है।

आज मीडिया पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि पत्रकारिता दो स्पष्ट खेमों में बंट गई है। एक खेमा सत्ता की लगभग हर नीति, निर्णय और बयान का बचाव करता दिखाई देता है, जबकि दूसरा सत्ता के लगभग हर कदम में कमी या दोष तलाशता नजर आता है। दोनों के अपने दर्शक, पाठक और समर्थक हैं। दोनों के पास अपने तर्क हैं और दोनों के आसपास अपनी-अपनी वैचारिक भीड़ है। समस्या यह नहीं कि पत्रकार सत्ता की आलोचना करता है या किसी नीति का समर्थन करता है। समस्या तब पैदा होती है जब पत्रकार की भूमिका ही किसी राजनीतिक पक्ष के समर्थन या विरोध तक सीमित हो जाए।

पत्रकारिता का काम सत्ता के पक्ष में खड़ा होना नहीं है। लेकिन उसका काम केवल सत्ता के विरोध में खड़ा होना भी नहीं है। उसका वास्तविक दायित्व सत्ता के सामने खड़ा होकर सवाल पूछना है। लोकतंत्र में सत्ता किसी एक दल, नेता या सरकार का निजी अधिकार नहीं होती। सत्ता जनता से प्राप्त जिम्मेदारी है और पत्रकारिता उस जिम्मेदारी की सार्वजनिक निगरानी का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए पत्रकार का पहला दायित्व किसी पार्टी, नेता या विचारधारा के प्रति नहीं, बल्कि तथ्यों, संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनहित के प्रति होना चाहिए।

यही कारण है कि पत्रकारिता में सवाल पूछना सबसे महत्वपूर्ण काम है। सरकार कोई निर्णय ले तो सवाल होना चाहिए कि वह निर्णय क्यों लिया गया, उसका उद्देश्य क्या है, उसका लाभ किसे मिलेगा, उसका नुकसान किसे उठाना पड़ेगा, उसके लिए कितना सार्वजनिक धन खर्च होगा और उसके परिणामों को कैसे मापा जाएगा। इसी तरह विपक्ष कोई दावा करे तो सवाल होना चाहिए कि उस दावे के तथ्य क्या हैं, उसका आधार क्या है, क्या उसका कोई वैकल्पिक प्रस्ताव है और उसके वादे कितने व्यावहारिक हैं। सवाल का पैमाना व्यक्ति या दल नहीं, तथ्य और जनहित होना चाहिए।

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल राजनीतिक दबाव नहीं है। एक दूसरी चुनौती भी उतनी ही गंभीर है—दर्शकों और पाठकों की पसंद। लोग अक्सर वही सुनना चाहते हैं जो उनकी पहले से बनी धारणा की पुष्टि करता हो। इससे मीडिया संस्थानों पर भी वही सामग्री प्रस्तुत करने का दबाव बढ़ता है जिसे उनका निर्धारित दर्शक वर्ग पसंद करता है। यहीं से पत्रकारिता और प्रचार के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है।

प्रचार का उद्देश्य किसी विचार, व्यक्ति या व्यवस्था के पक्ष में जनमत बनाना होता है। पत्रकारिता का उद्देश्य उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जनता को जानकारी देना और आवश्यक सवाल उठाना है। दोनों के बीच अंतर हमेशा शब्दों से नहीं, बल्कि काम करने की पद्धति से दिखाई देता है। पत्रकारिता में स्रोतों की जांच, दावों का सत्यापन, संदर्भ की पड़ताल और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देना महत्वपूर्ण है। इसके विपरीत, जब निष्कर्ष पहले तय हो और तथ्य केवल उसे सही साबित करने के लिए चुने जाएं, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

एक पत्रकार से गलती हो सकती है। कोई तथ्य गलत रिपोर्ट हो सकता है या किसी खबर में संदर्भ छूट सकता है। लेकिन विश्वसनीय पत्रकारिता की पहचान यह है कि गलती सामने आने पर उसे सुधारा जाए, स्रोतों की दोबारा जांच की जाए और अपनी रिपोर्टिंग पर लगातार आत्ममंथन किया जाए। निष्पक्षता का अर्थ यह भी नहीं कि हर मुद्दे पर दोनों पक्षों को बराबर सही बताया जाए। यदि किसी दावे के समर्थन में मजबूत तथ्य हैं और दूसरे दावे के समर्थन में नहीं, तो पत्रकार का दायित्व तथ्यों को उसी अनुपात में सामने रखना है। संतुलन का अर्थ झूठ और सच को बराबर वजन देना नहीं हो सकता।

इसी तरह सत्ता से सवाल करना सत्ता-विरोधी होना नहीं है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की प्रक्रिया है। जो सरकार जनता के नाम पर निर्णय लेती है, उससे जनता के सवाल पूछे जाना स्वाभाविक है। दुर्भाग्य से आज कई बार पत्रकार की पहचान उसके सवालों से कम और उसके राजनीतिक झुकाव की धारणा से अधिक की जाती है। पत्रकार ने सरकार से सवाल पूछा तो उसे विरोधी खेमे का बताया जाता है। उसने सरकार के किसी निर्णय के पक्ष में तथ्य रखे तो उसे समर्थक कह दिया जाता है। इस तरह पत्रकार के प्रश्न पर चर्चा कम और उसकी कथित निष्ठा पर चर्चा अधिक होने लगती है।

यह स्थिति पत्रकारिता के लिए ही नहीं, लोकतंत्र के लिए भी चुनौती है। एक स्वस्थ मीडिया व्यवस्था में सरकार की आलोचना भी होनी चाहिए और उसके अच्छे कामों की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग भी। विपक्ष की कमियों पर भी सवाल होने चाहिए और उसके वैध सवालों को भी जगह मिलनी चाहिए। पत्रकार का काम किसी पक्ष को खुश करना नहीं, बल्कि नागरिक को अधिक जानकारी देकर उसे स्वयं निष्कर्ष तक पहुंचने योग्य बनाना है। पत्रकारिता का मूल्य इस बात से नहीं तय होना चाहिए कि उसकी खबर से कौन खुश हुआ और कौन नाराज, बल्कि इससे कि उसने जनता के सामने कितनी विश्वसनीय और सत्यापित जानकारी रखी।

निष्पक्ष पत्रकारिता का रास्ता इसलिए आसान नहीं है। सत्ता उससे नाराज हो सकती है। विपक्ष भी नाराज हो सकता है। विज्ञापनदाता असहज हो सकते हैं। सोशल मीडिया की भीड़ आलोचना कर सकती है और अपने ही पाठक या दर्शक असहमति जता सकते हैं। फिर भी पत्रकारिता की असली परीक्षा वहीं होती है जहां पत्रकार को अपने सुविधाजनक पक्ष के विरुद्ध भी तथ्य प्रकाशित करने पड़ें। यदि कोई पत्रकार केवल वही सवाल पूछता है जिनके जवाब से उसका अपना समर्थक वर्ग प्रसन्न होता है, तो उसके सामने आत्ममंथन का प्रश्न अवश्य खड़ा होता है।

पत्रकारिता का अर्थ न सत्ता की गुलामी है, न विपक्ष की वफादारी। न प्रचार, न प्रतिशोध। न किसी विचारधारा की अंधभक्ति, न हर बात में विरोध के लिए विरोध। पत्रकारिता का मूल आधार तथ्य, सवाल, संदर्भ और जनहित है। लोकतंत्र को ऐसे पत्रकारों की आवश्यकता है जो सत्ता से सवाल पूछ सकें, विपक्ष से भी सवाल पूछ सकें, अपने स्रोतों की जांच कर सकें और अपनी धारणाओं पर भी संदेह करने का साहस रखें।

क्योंकि पत्रकार का काम सत्ता बदलना नहीं है। चुनाव जनता का अधिकार है और सत्ता बदलने या बनाए रखने का निर्णय मतदाता करता है। पत्रकार का काम इससे अलग है। उसका काम है सत्ता से पूछना कि उसने क्या किया, क्यों किया, किसके लिए किया और उसके परिणामों की जिम्मेदारी कौन लेगा। इसी तरह उसका दायित्व विपक्ष से पूछना भी है कि उसके आरोपों और वादों का आधार क्या है।

लोकतंत्र में पत्रकार सत्ता का मित्र या शत्रु नहीं होना चाहिए। उसे जनता के सवालों का माध्यम होना चाहिए। जब पत्रकार सवाल पूछता है, दस्तावेजों की जांच करता है, दावों को परखता है और सत्ता तथा विपक्ष दोनों से जवाब मांगता है, तभी पत्रकारिता अपनी लोकतांत्रिक भूमिका निभाती है। और जब पत्रकार सवाल पूछना छोड़ देता है, तब सूचना के साधन तो बहुत रह जाते हैं, लेकिन पत्रकारिता धीरे-धीरे कम होती जाती है। आखिर पत्रकारिता की असली पहचान किसी खेमे के साथ खड़े होने में नहीं, बल्कि हर खेमे से सवाल पूछने के साहस में है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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