राजनीति

राजनीति की बेलगाम ज़ुबान और नफ़रत का खेल

​भारतीय लोकतंत्र का आधार विविधता, सहअस्तित्व और विचार-विमर्श की समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश, हाल के वर्षों में राजनीतिक विमर्श का स्तर जिस तेज़ी से गिरा है, वह अत्यंत चिंताजनक है। चुनाव जीतने और सत्ता बचाने की होड़ में जिस प्रकार बेलगाम बयानबाज़ी हो रही है तथा समाज को धार्मिक ध्रुवीकरण की आग में झोंका जा रहा है, उसने देश के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
​आवेश में दिए गए बयान और गिरता राजनीतिक स्तर
​आज राजनीति जनसेवा तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार व अर्थव्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों से हटकर जनभावनाओं को भड़काने का ज़रिया बनती दिख रही है। नेता मंच संभालते ही आवेश में आकर ऐसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हैं जो सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देती है।
​मुद्दों से भटकाव, जब काम और विकास के नाम पर वोट मांगना कठिन प्रतीत होने लगता है, तब धार्मिक ध्रुवीकरण को सबसे आसान रास्ता मान लिया जाता है।
​संवेदनहीनता,आवेश में दिए गए बयान भले ही तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए हों, लेकिन इनका ख़ामियाज़ा आम जनता को सांप्रदायिक तनाव, अविश्वास और भय के माहौल के रूप में भुगतना पड़ता है।
देश किस दिशा में जा रहा है?
​नफ़रत और ध्रुवीकरण की यह राजनीति देश को एक अत्यंत ख़तरनाक मोड़ पर ले जा रही है,
​सामाजिक ताने-बाने का बिख़राव,भारत की मूल ताक़त उसकी “विविधता में एकता” रही है। जब आमजन के बीच धर्म के आधार पर अविश्वास का बीज बो दिया जाता है, तो समाज भीतर से कमज़ोर होने लगता है।
​आर्थिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव,कोई भी देश नफ़रत और अशांति के वातावरण में प्रगति नहीं कर सकता। निवेशक और उद्योग ऐसे माहौल से दूर रहते हैं जहाँ सामाजिक स्थिरता का अभाव हो।
​युवाओं का दिशाभ्रम,देश की जिस युवा ऊर्जा का उपयोग शिक्षा, नवाचार और निर्माण में होना चाहिए था, वह अक्सर इस प्रायोजित वैमनस्य की भेंट चढ़ रही है।
​अंतरराष्ट्रीय साख़ को धक्का,विश्व पटल पर भारत की पहचान एक सहिष्णु और तेज़ी से उभरते लोकतंत्र की रही है। ज़हरीली बयानबाज़ी और सांप्रदायिक वैमनस्य से देश की वैश्विक छवि प्रभावित होती है।
क्या इस पर लगाम नहीं लगनी चाहिए?
​बिल्कुल लगनी चाहिए, और यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग है। यदि अब भी कठोर क़दम नहीं उठाए गए, तो लोकतंत्र की बुनियाद ही कमज़ोर पड़ जाएगी। इसके लिए बहुस्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है,
​चुनाव आयोग और न्यायपालिका की सख्त भूमिका, सिर्फ़ ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी करने से सुधार संभव नहीं है। नफ़रत फैलाऊ भाषण देने वाले नेताओं के चुनाव लड़ने पर निश्चित अवधि के लिए कड़ा प्रतिबंध लगना चाहिए।
​राजनीतिक दलों की नैतिक जवाबदेही,राजनीतिक दलों को स्वयं आगे आकर नफ़रत फैलाने वाले नेताओं पर कठोर संगठनात्मक कार्रवाई करनी होगी,चाहे वे कितने भी बड़े पद पर क्यों न हों।
​मीडिया की ज़िम्मेदारी,टीआरपी के चक्कर में उत्तेजक बयानों और धार्मिक बहसों को सनसनीखेज़ बनाकर प्रस्तुत करने वाले मंचों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
​जनता की जागरूकता (सबसे महत्वपूर्ण),लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास है। जब तक नागरिक ‘फूट डालो और राज करो’ की इस नीति को पहचानकर विकास, शिक्षा और रोज़गार के मुद्दों पर वोट नहीं देंगे, तब तक राजनीति का यह ढर्रा नहीं बदलेगा।
​सत्ता और सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश हमेशा रहता है। यदि सत्ता के लिए देश की एकता और शांति को दांव पर लगाया जाता रहेगा, तो इसका ख़ामियाज़ा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
​अब समय आ गया है कि देश का नागरिक जाति और धर्म के चश्मे को उतारकर जनप्रतिनिधियों से उनके काम का हिसाब मांगे और नफ़रत फैलाने वाली हर ज़ुबान को अपने वोट की ताक़त से निरुत्तर करे।

​– डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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