गीत
किसके लिए सजाए राधा
तूने कुंकुम और रंगोली।
किसके इंतजार में पागल
बैठी है,तू कितनी भोली।।
वह तो छलिया, मधु का लोभी
उपवन के पुष्पों का भोगी।
भंवरा है,वह हाथ न आए
तू क्यों उसके प्रेम में रोगी।।
दीपक जला राह तकती हो
सुनती हो सखियों की बोली।।
नेह निमंत्रण भूल गया सब
प्रेम समर्पण धूल भया अब।
कौन गली,किस पथ से निकला
झोंका किसके पास रुका कब।
हिरनी तू कस्तूरी ढूंढे
किसके बहकावे में हो ली।।
यह बनाव श्रंगार अनूठा
सच तू,उसका प्यार हि झूठा।
कमल पत्र सी बन निर्लिप्ता,
प्यार बहुत रहता है रूठा।।
वृंदावन की मलय बसंती
बिछ गए मोती जब तू रो ली।।
— सतीश चन्द्र श्रीवास्तव
