कविता

पिता परिवार की पहचान है

पिता
एक रिश्ता भर नहीं होता
बल्कि एक पूरा जीवन होता है
जो अपने लिए नहीं
बल्कि जीते है अपने परिवार के लिए ।

पिता
अपने परिवार के लिए ही मर मिटता,
क्योंकि
उसके भीतर शब्द नहीं
जिम्मेदारियो का पहाड़ उठाता हैं।

पिता का त्याग की प्रतिमूर्ति है
कमज़ोरी नहीं
एक लंबी साधना है
वह हर रोज़
अपने हिस्से का सुख
चुपचाप त्याग देता है।

पिता हँसता नहीं है
इसका अर्थ यह नहीं
कि पिता को हँसी नहीं आती
बल्कि
वह हँसी को बच्चों के
चेहरों पर दिखना चाहता है।

पिता
थकता तो है
पर बताता नहीं
पिता टूटता
लेकिन बिखरता नहीं,
उसके टूटने से
घर भी टूट सकता है
और परिवार बिखर जायेगा।

पिता की तपस्या
एक लंबी साधना है
वह हर रोज़
अपने हिस्से का सुख
चुपचाप त्याग देता है
ताकि परिवार में खुशी कायम रहे।

पिता का रूखापन
धूप में जली हुई
कोमल चिंता होती है
जिसके पीछे
परिवार का
सुनहरा भविष्य होता है।

पिता की इच्छाएँ
कभी पूरी नहीं होतीं
वे घर की ज़रूरतों में
टुकड़े टुकड़े होकर
ख़त्म हो जाती हैं।

पिता
आँसू को भी
छुप-छुप पीता है
परिवार की खुशी लिए करता है
और आशीर्वाद भी
बिना जताए देता है।

पिता
जब तक साथ होता है,
उसकी कीमत नहीं समझ आती
जब याद बन जाता है
तो पूरा जीवन
उसके नाम
नम हो जाता है।

आजकल श्राद्धो में
गोलोक वासी पिता को
देते है तर्पण
श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते है
और याद करते है पूज्य पिता जी को।

— कालिका प्रसाद सेमवाल

कालिका प्रसाद सेमवाल

प्रवक्ता जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, रतूडा़, रुद्रप्रयाग ( उत्तराखण्ड) पिन 246171

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