एक दीवाली ऐसी भी हो
एक दीवाली ऐसी भी हो
जल उठे जब मन की ज्योति भी
जहाँ में कहीं न कोई गरीबी हो
हर हाथ खुशी की चाभी हो
न रोये कहीं एक भी बच्चा
घर घर में आतिशबाजी हो
खिल जाए मन का गुलाब भी
हर मुखड़े पर प्यारी सी लाली हो
न हो देश में कहीं भी मातम
जन जन की रात निराली हो
जगमग जगमग करें दीप सभी
हर घर में बस खुश हाली हो
जल जाएं मन के दुर्गुण सभी
महफ़िल में दीपों की कव्वाली हो
नजर जाए जिस ओर जब भी
अमावस की रात भी उजाली हो
क्यों न करें आज एक वादा सभी
खरीदेंगे हम सभी मिट्टी के दीपक भी
न करेंगे मोल भाव उनसे कभी
काश घर घर दुआओं की दीवाली हो
— वर्षा वार्ष्णेय
