डिफॉल्ट

रोला छंद

क्यों कहना अपवाद, नया लगता क्या भाई।भरे पेट की बात, हमेशा हो सुखदाई।।कहें मित्र यमराज, मुफ्त मेरा संदेशा।सबका भरता पेट, जगत का हो परिवेशा।।२५८एक साथ निर्वाह, भला कैसे हो सकता।कटुता भरे विचार, साथ अपने ले चलता।।कहें मित्र यमराज, यही मुश्किल है भारी।जाती कितनी दूर, भला ऐसी कब यारी।।२५९मानवता से प्यार, लगे लोगों को भारी।दूषित हुआ समाज, नयी आई बीमारी।।कहें मित्र यमराज, कोशिशें मिलकर करिए।जिम्मेदारी आप, साथ जन-मन के चलिए।।२६०मानवता के मीत, आपको अपने कहते।बेचारों का खून, दिखे दुनिया को बहते।।कहें मित्र यमराज, रोग नित बढ़ता जाता।कौन भला अब आज, काम किसके हैं आता।।२६१देता कितना साथ, आज अब कितना भाई।इससे आज समाज, दुःखी है हे रघुराई।।कहें मित्र यमराज, समझिए इसकी माया।जितना कम उपयोग, स्वस्थ हो उतनी काया।।२६२जो बोया सो काट, व्यर्थ है तेरा रोना।विधि का यही विधान, मुफ्त मिलता है सोना।।कहें मित्र यमराज, कर्म फल सबका अपना।चाहे जितना आप, बैठकर देखें सपना।।२६३उगल रहे हैं आग, चोर है मन में जिनके।जान रहे वे लोग, भाव कितने हैं किनके।। कहें मित्र यमराज, पड़ेगा इनको भारी। यही जोड़कर हाथ, कहेंगे हम बीमारी।।२६४अगर आप कमजोर, समझते हैं लाचारी।जितने आज अमीर, मान लेते बीमारी।।कहें मित्र यमराज, वेदना इनकी सुनिए।मत करिए उपकार , मगर गलबहियां करिए।।२६५भीतर बाहर द्वंद्व, आज प्राणी में दिखता।होता खुद लाचार, व्यर्थ जाने क्यों लिखता।।कहें मित्र यमराज, दौर आया ये कैसा।जीना है बेकार, नहीं आए जब पैसा।।२६६सहनशीलता ठीक, मगर ये भी तो सोचो। समझ रहें हैं लोग, आप कहते आ नोचो।। कहें मित्र यमराज, तभी तक लगता अच्छा। नहीं खींचते लोग, आपका जब तक कच्छा।।२६७नहीं समय है आज, आपके कल के जैसा। बड़े प्यार से लोग, माँगते रहते पैसा।। कहें मित्र यमराज, एक दिन ऐसा चुभता। सहनशील हो आप, तभी तो इतना दुखता।।२६८धैर्य रखें हम आप, हाथ में उसके खंजर।खुद को मानो यार, अक्ल से पूरे बंजर।।कहें मित्र यमराज, समय की देखो माया।सिर पर खूब सवार, कौन अपना है भाया।।२६९जंतर-मंतर नाम, केंद्र में जिसकी चर्चा।इसका दिया निकाल, आज बाबा ने पर्चा।।कहें मित्र यमराज, खेलते साँप छछूंदर।इठलाता है खूब, भाग्य निज जंतर-मंतर।।२७०रंका-बंका सौभाग्य, अक्ल है जिसमें इतना।जंतर-मंतर राज, करेंगे आखिर कितना।।कहें मित्र यमराज, बुद्धि का बजता डंका।पर पहले अधिकार, सिर्फ है प्यारे रंका।।२७१चिट्ठी वाला दौर, याद सबको है आता। खुशियों का वो भोर, आँख गीली कर जाता।। कहे मित्र यमराज, प्यार उसमें जो होता। मुस्कानों के साथ, बीज आँसू के बोता।।२७२देता कितना साथ, आज अब कितना भाई।इससे आज समाज, बहुत दुःखी रघुराई।।कहें मित्र यमराज, समय यह कैसा आया।भाई दुश्मन आज, भेद भी अब शरमाया।।३७३भाई का हो साथ, हार भी डर कर भागे।सोते हैं हम चैन, हमारा भाई जागे।।कहें मित्र यमराज, साथ जो छूटे भाई।इससे बढ़कर और, बड़ा दुख कब दुखदाई।।२७४जरा-जरा सी बात, आप हमको दुख देता।करता मानव प्रेम, खूब अब इसको सेता।।कहें मित्र यमराज, भला किसको समझाए।समय कहाँ है आज, कौन किसके घर जाए।।२८५गाते उसके गीत, काम जो अपने आते।नहीं स्वार्थी लोग, कभी हमको हैं भाते।।कहें मित्र यमराज, ध्यान बस इतना रखिए।ऐरे-गैरे मीत, कभी मत अपना कहिए।।२७६तुलना करना व्यर्थ, समय की है बरबादी।होगा ही नुकसान, रहे यदि इसके आदी।।कहें मित्र यमराज, समझना बहुत जरूरी।तभी सफल उद्देश्य, चलो रख इससे दूरी।।२७७स्वारथ के सब मीत, सभी कहने को साथी।।झूठा इनका गीत, लालची जैसे हाथी।।कहें मित्र यमराज, जमाना आया ऐसा।करना है व्यवहार, चाहता है जो जैसा।।२७८धरती के हालात, भले हैं बहु दुखदाई।समझ रहे हम आप, झूठ है बिल्कुल भाई।।कहें मित्र यमराज, धरा इतनी हरियाली।नहीं रहेगी आज, बनाएंगे हम काली।।२७९लेते हम सौगंध, मातु-पितु सेवा करना।नहीं। करेंगे पाप, दंड कल में क्यों सहना।।कहें मित्र यमराज, यही द्वय मेरे ईश्वर।नहीं जगत में और, कहें जिसको परमेश्वर।।२८०जीवन है संग्राम, अनवरत लड़ते जाना।कभी नहीं आराम, पड़ा है ठोकर खाना।ऐसा हो उपयोग, काम जो सबके आए।करके पर उपकार,ख़ुशी मन को मिल जाए।।२८१व्यर्थ विजय की बात, करो मत रण से पहले।तब सुंदर मृदुगात, जीत जब देते नहले।।कहें मित्र यमराज, यही कहती है गीता।कम बोले जब कर्म, करे अधिकाधिक रीता।।२८२मर्यादा के राम, प्रेम करुणा के सागर।जूठे शबरी बेर, नेह की फैला चादर।सह कर कष्ट अनेक, संग सीता वन फिरते।मुख पर है मुस्कान, राम देखें कब गिरते।।२८३राम हमारे इष्ट, यही हैं प्राण हमारे।राम बिना सब व्यर्थ, कौन हमको तब तारे ।बाँधा सागर सेतु, बीच पहुँचे जा लंका।ऐसे मेरे राम, जगत् में बजता डंका।।२८४करवा चौथ का पर्व, आज फिर पावन आया।कर सोलह श्रृंगार, नारि का मन हर्षाया।।कहें मित्र यमराज, कामना जो भी इनकी।पूरी हो सब आज, चाह हो जैसी जिनकी।।२८५कलयुग का अभिशाप, किसे पड़ता है भारी।ऐसा लगता आज, पुरानी इससे यारी।।कहें मित्र यमराज, कौन अब इससे डरता।बेचारा अभिशाप, बिना मारे ही मरता।।२८६

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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