अखिलता की विकल उड़ानों में
अखिलता की विकल उड़ानों में, तटस्थित होने की तरन्नुम में; उपस्थित सृष्टा सामने होता, दृष्टि आ जाता कभी ना आता
Read Moreअखिलता की विकल उड़ानों में, तटस्थित होने की तरन्नुम में; उपस्थित सृष्टा सामने होता, दृष्टि आ जाता कभी ना आता
Read Moreभव्य भव की गुहा में खेला किए, दिव्य संदेश सतत पाया किए; व्याप्ति विस्तार हृदय देखा किए, तृप्ति की तरंगों
Read Moreहै ज्ञान औ अज्ञान में, बस भेद एक अनुभूति का; एक फ़ासला है कर्म का, अनुभूत भव की द्रष्टि का
Read Moreचन्द्र का प्रतिबिम्ब, ज्यों जल झिलमिलाए; पुरुष का प्रतिफलन, प्राणों प्रष्फुराए ! विकृति आकृति शशि की, जल-तल भासती कब; सतह
Read Moreआज आया लाँघता मैं, ज़िन्दगी में कुछ दीवारें ; खोलता मैं कुछ किबाड़ें, झाँकता जग की कगारें ! मिले थे
Read Moreसमर्पण बढ़ रहा है प्रभु चरण में, प्रकट गुरु लख रहे हैं तरंगों में; सृष्टि समरस हुई है समागम में,
Read Moreकितने मासूम से सबाल रहे, बवाल बिना बात होते रहे; ख़याल अपने अपने सब थे रहे, ख़ुदी को खोते राह
Read Moreउरों के आसमान छूने में, सुरों की सरिता में नहाने में; वक़्त कितना है प्राय लग जाता, कहाँ अहसास परम
Read Moreकितनी कलियों को जगाया मैंने, कितनी आत्माएँ परश कीं चुपके; प्रकाश कितने प्राण छितराये, वायु ने कितने प्राण मिलवाये !
Read Moreहोते हुए भी हैं कहाँ, हम जहान में रहते कहाँ; देही यहाँ आत्मा वहाँ, बस विचरते यों हीं यहाँ !
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