मधुगीति – मग रहे कितने सुगम जगती में
मग रहे कितने सुगम जगती में, पंचभूतों की प्रत्येक व्याप्ति में; सुषुप्ति जागृति विरक्ति में, मुक्ति अभिव्यक्ति और भुक्ति में
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Read Moreव्हाट्सऐप, फ़ेसबुक, लिंकिडइन, मैसेंजर, ट्विटर, इत्यादि समूहों को हम में से बहुत से व्यक्ति अतिशय उपयोग कर रहे हैं ।
Read Moreआज अपेक्षा है कि मनुष्य सात्विक आहार कर अपने तन मन को स्वस्थ रखें ।अपने लिये उचित व आवश्यक आहार
Read Moreशून्यता कैसी व्याप्त कैसे हुई, कितनी क्यों कहाँ कब से आई रही; कितना ब्रह्माण्ड अण्ड प्रकटा किया, पिण्ड कितनों को
Read Moreउर की तरन में घूर्ण दिए, वे ही तो रहे; सम-रस बनाना वे थे चहे, हम को विलोये ! हर
Read Moreआए रहे थे कोई यहाँ, पथिक अजाने; गाए रहे थे वे ही जहान, अजब तराने ! बूझे थे कुछ न
Read Moreरश्मि आकाश जो परश करती, यान खिड़की से उझक जो जाती; बात कुछ उनके हृदय की करती, तरंगित प्राण मन
Read Moreवे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं, सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं; संस्थिति प्रलय लय उनके
Read Moreभारत भरत का स्वप्न बना, आज जग रहा; अरवों ही जीवनों को उठा, ज्योति विच पगा ! सम्पन्न हुए मन
Read Moreहैं वानप्रस्थी बृद्ध हुए, बिना वन गए; वालक सभी प्रयाण किए, ग्रहस्थी हुए ! ग्रह अपने वे बसाये, रहे संतति
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