गीत/नवगीत

किलकावत काल पुरुष !

किलकावत काल पुरुष, धरती पै लावत;
रोवन फिरि क्यों लागत, जीव भाव पावत !
संचर चलि जब धावत, ब्राह्मी मन होवत;
महत अहम चित्त भ्रमत, पंच भूत होवत !
प्रतिसंचर प्राण पात, वनस्पति जन्तु होत;
मनुज ध्यान जबहि जात, होत ब्रह्म प्रणि- पात !
गात पात गति सुहात, महिमा भरि भुवन देत;
भावन में गंग बहत, मज्जन उर नित करवत !
किलकारी वालन वत, हुँकारी केहरि मत;
मारन तब ‘मधु’ पावत, प्रभु चरणन सहलावत !