अपूर्ण यावत्…
झुण्ड झुण्ड में बंटा हुआ हैटुकड़ा टुकड़ा में बंटा हुआ हैजहां में जहां तक की बातेंअर्थात…,संसार की यावत् की बातें…!
Read Moreझुण्ड झुण्ड में बंटा हुआ हैटुकड़ा टुकड़ा में बंटा हुआ हैजहां में जहां तक की बातेंअर्थात…,संसार की यावत् की बातें…!
Read Moreअभी-अभीधरती पर कदम रखाएक हाड़ मांसजान प्राण का टुकड़ाबालक को हाथों में लेकरबड़ी दुलार सेबहुत ही प्यार सेहसरत भरी निगाहों
Read Moreएक विद्वान ने सुबह-सुबह चाय पिया और कहा…, ‘रात हो चुका है…!’ लोगों ने सोचा…, उन्होंने कहा है तो सत्य
Read Moreबहुत देखा हूं…,संसार को जानने के लिएचला मुसाफिर भीवापस आए स्वयं को भूलाकर ! गुलशन में गएगुल और खुशबू के
Read Moreदूर से…,चांद को देखता रहामगर… पा ना सका…! गुरुर से…,आसमान को निहारता रहामगर… कभी छू न सका…! सुरूर से…,हवा को
Read Moreबेपरवाह भीतर के मंजर । लापरवाह भीतर के डर ।। मन भीतर के आकृति । दर्द भीतर के संतुष्टि ।।
Read Moreचंद किस्से अपने ख़्वाबों के सुनाने आया हूँ, ज़ख्म तन्हा रातों के तुमको दिखाने आया हूँ। मुद्दतों से रोक रक्खा
Read Moreजब जन्म लेते हैं…, सांसें होती हैं, नाम नहीं होता…। जब मरते हैं…, नाम होता है, सांसें नहीं होती…।। सांसें
Read Moreमुक्त नहीं है मन का कोई वातावरण।। नाता से नाता हरण…! वेदनाओं का शूल और छाती की धड़कन । अभी
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