Author: डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

सामाजिक

बेटियों को सिर्फ संस्कारी नहीं, बल्कि सशक्त, आत्मनिर्भर और जागरूक  बनाइए

बेटी जिगर का टुकड़ा है,बेटियां माता-पिता के दिल के बेहद क़रीब होती हैं, उनकी परवरिश में प्यार और सुरक्षा दोनों

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कविता

ख़्वाबों की बर्फ़ में छुपा चाँद

धूप की चादर, सर्द हवाओं का आलम,ख़ामोश लम्हे, पिघलती उम्मीदें,बिखरी मुस्कान, आँखों में ठहरा पानी। यादों की परछाईं, मोहब्बत की

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सामाजिक

संस्कार व्यक्ति के विचारों, मूल्यों, और व्यवहार को आकार देते हैं

दोस्ती को परिभाषित करने के लिए, हमें यह समझना होगा कि दोस्ती क्या है और क्या नहीं है।दोस्ती की परिभाषा

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