ग़ज़ल – वक़्त के रहते रहते
बदल दी हमने राह अपनी वक़्त के रहते रहते,उतार दी ज़ंजीरें-रिश्तों की वक़्त के रहते रहते।थक गए थे हम चिराग-ए-आरज़ू
Read Moreबदल दी हमने राह अपनी वक़्त के रहते रहते,उतार दी ज़ंजीरें-रिश्तों की वक़्त के रहते रहते।थक गए थे हम चिराग-ए-आरज़ू
Read Moreकिसी भी राष्ट्र की नियति केवल उसकी सीमाओं या सरकारी नीतियों से तय नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के सामूहिक
Read Moreआज के डिजिट्ल युग में, जहाँ संदेश उंगलियों की एक ‘टैप’ पर पहुँच जाते हैं, बीते दौर के वो नीले
Read Moreसाहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समाज की चेतना का जीवंत दस्तावेज़ होता है। वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति
Read Moreवादी-ए-कश्मीर की वह शाम अपनी पूरी रानाइयों के साथ ढल रही थी। पहाड़ों की ऊँची चोटियों पर जमी बर्फ़, डूबते
Read Moreमातृ दिवस आते ही सोशल मीडिया स्टेटस और विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है और यह एक ऐसा विषय है
Read Moreआज का दौर चुनौतियों से भरा है। बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता ने लाखों युवाओं के सपनों को कुचल दिया
Read Moreवक़ार अहमद की ज़िंदगी अब एक ठहरी हुई झील की तरह थी। एक छोटा सा शहर, चंद वफ़ादार दोस्त और
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