अभी कुछ वक़्त बाक़ी है
सुनो!यह शाम आख़िरी तो नहीं,कि जिसके बाद कोई सुबह न हो।अभी तो धड़कनों के बीचजुदाई के दुख का धुआँ ज़रूर
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Read Moreशाम ढल रही थी, और रेलवे स्टेशन के पुराने पीपल के पेड़ पर परिंदों का शोर धीरे-धीरे थम रहा था।
Read Moreजीवन के साठ से अधिक वसंत देख लेने के बाद भी फिटनेस और एक अनुशासित दिनचर्या के प्रति सजग रहना
Read Moreचंबल की सुलगती फ़िज़ाओं में सिर्फ़ बारूद की तीखी गंध और ख़ून के कतरे ही नहीं तैरते थे, बल्कि एक
Read Moreयह उस दौर की बात है जब इश्क़ ज़मानों और सरहदों का मोहताज नहीं हुआ करता था, बल्कि दो दिलों
Read Moreशाम की छाया गहरी हो रही थी। महाविद्यालय की उस पुरानी और ऐतिहासिक पुस्तकालय की खिड़की से बाहर का दृश्य
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