घर के भेदी: देश की जड़ें खोदते भीतरघाती
देश को बाहर से नहीं, भीतर से खतरा है। जब कोई सुरक्षा गार्ड, छात्र या यूट्यूबर चंद रुपयों या झूठे
Read Moreदेश को बाहर से नहीं, भीतर से खतरा है। जब कोई सुरक्षा गार्ड, छात्र या यूट्यूबर चंद रुपयों या झूठे
Read Moreजब हर दर्द से टकराकर,मन की दीवारें दरकने लगें,और उम्मीदों की चादर,चुपचाप सरकने लगे। जब हँसी की परतें,ग़म के नीचे
Read More500 की शर्ट में, संजीदा मुस्कान,5000 की साड़ी से बुनता सम्मान।हाथों में उसके, बिन शब्दों की बातें,हर तह में छुपा,
Read Moreमुठ्ठी भर मुगल और अंग्रेज देश पर सदियों राज नहीं करते यदि भारत में गद्दार प्रजाति न होती। यह बात
Read Moreवो जो साड़ी के किनारे में,सिहरती हैं चुप्पी की नर्म लहरें,वो जो पायलों में खनकती हैं,अधूरे स्वप्नों की डरी हुई
Read Moreरजत के धागों से बुनीसमय की श्वेत चादर,प्रशांत नभ की मौन गाथा,अतीत की बिखरी मुस्कान। सांसों की तूलिका से,अमिट रेखाएं
Read Moreकभी बैठ अकेले,धुंधले चांद की परछाईं में,सांसों की लय पर सुनना,वक़्त की खामोश धुन,जहां हर सफ़ेद लहर,मौसम की थकी आह
Read Moreतकलीफें, जो दिखती नहीं,मगर भीतर चुभती रहती हैं।कह न सके जो दिल की भाषा,वो लहरें मद्धम-सी बहती हैं। आँखों में
Read Moreनींद तो हर रोज़ खुलती है,पर क्या खुलती हैं आँखें सच में?मन के अंधेरों में कहीं छुपी,एक उम्मीद सी कब
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