पारंगामिता
जब पारंगामिता , परम्परागत होती है। तब परिहारिक, अपने कला की, परिमिता को पार कर जाता है। पार्थिव का आकलन
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Read Moreकौवा कांव-कावं करता हुआ, घर के मुन्डेर पर देता दस्तक। अपनी आवाज़ में भूख को इंगित, करता हुआ। नर से
Read Moreपिघल उठता है हृदय, जब नजर जाती है फुटपाथ पर, कैसे ? बिताते हैं अपना जीवन। उस भयानक डगर पर।
Read Moreजिन्दगी में अपने सपनों का बीज बोईए। जीवन में अद्धभुत परिणाम पा जाइए। दुनिया में लोगों के मार्गदर्शन के लिए,
Read Moreतुझे जाना ही था तो सोया था, मुझे जगा क्यों दिया। मेरे साथ दगा करके, निचाशय का प्रमाण क्यों दिया।
Read Moreरात में निद के आगोश में, एक बार प्रिये का दृगपलक, उठे उपर सहज नीचे गिरे, छलकती बाढ़ सी सौंदर्य
Read Moreकौन हो तुम…….. मेरे हदय में, लिए वास तुम……. अलछित। कसक देती हो…… स्वेच्छा से, शाश्वत स्तिमित मर्म सम्पुटित। हलचल
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