Author: *डॉ. रूपचन्द शास्त्री 'मयंक'

संस्मरण

संस्मरण – अच्छे साहित्यकार नहीं, अच्छे व्यक्ति बनिए

बाबा नागार्जुन की इतनी स्मृतियाँ मेरे मन और मस्तिष्क में भरी पड़ी हैं कि एक संस्मरण लिखता हूँ तो दूसरा

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संस्मरण

संस्मरण “अच्छे साहित्यकार नहीं अच्छे व्यक्ति बनिए”

संस्मरण “अच्छे साहित्यकार नहीं अच्छे व्यक्ति बनिए”—(चित्र में- (बालक) मेरा छोटा पुत्र विनीत, मेरे कन्धे पर हाथ रखे बाबा नागार्जुन

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गीत/नवगीत

“सत्य-अहिंसा की मैं अलख जगाऊँगा”

जो मेरे मन को भायेगा,उस पर मैं कलम चलाऊँगा।दुर्गम-पथरीले पथ पर मैं,आगे को बढ़ता जाऊँगा।।—मैं कभी वक्र होकर घूमूँ,हो जाऊँ

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गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल “शहर-ए-दिल्ली को बदलने दीजिए”

आग को सीने में जलने दीजिएजमुन से गंगा निकलने दीजिए—अपनी अस्मत को बचाने के लिएफूल को काँटों में पलने दीजिए—अज़नबी

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मुक्तक/दोहा

चौबीस दोहे “पथ होते अवरुद्ध”

तानाशाही से लुटी, बड़ी-बड़ी जागीर।जनमत के आगे नहीं, टिकती है शमशीर।१।—सुलभ सभी कुछ है यहाँ, दुर्लभ बिन तदवीर।कामचोर ही खोजते,

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गीत/नवगीत

“आया बसन्त-आया बसन्त”

सबके मन को भाया बसन्त।आया बसन्त-आया बसन्त।। उतरी हरियाली उपवन में,आ गईं बहारें मधुवन में,गुलशन में कलियाँ चहक उठीं,पुष्पित बगिया

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