सूखती धरती, बढ़ती प्यास : जल दिवालियापन की ओर बढ़ता भारत
जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, सभ्यता, आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। मानव
Read Moreजल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, सभ्यता, आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। मानव
Read Moreनाम-पता सब देह के, जग के मात्र निशान।आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥ मोबाइल, घर, गाँव सब, बदलें दिन
Read Moreकिसी भी देश की कानून-व्यवस्था का सबसे दृश्यमान चेहरा पुलिस होती है। जब कोई अपराध होता है, दुर्घटना घटती है,
Read Moreनन्हे-नन्हे पाँव में,चंचलता की धूप।घर-आँगन महका उठे,हँसी बने स्वरूप॥ कूदें, नाचें, गुनगुनाएँ,भरें खुशी के रंग।भोले मन की खिलखिली,सबसे प्यारा ढंग॥
Read Moreजंजीरें यदि न कट सकें, बदलो अपनी चाल।लंगड़ाकर चलना भला, मत स्वीकारो जाल॥ बंधन चाहे लाख हों, मत खोना विश्वास।हिम्मत
Read Moreघर-आँगन की छाँव में, पलते प्रेम-विचार।लोभ लगा जब मन कहीं, टूटे सब परिवार॥ माटी केवल खेत की, नहीं हृदय का
Read Moreहरियाणा में सामने आए 661 करोड़ रुपये के कथित आईडीएफसी बैंक प्रकरण ने केवल एक वित्तीय अनियमितता के आरोपों को
Read Moreकोई यहाँ कबीर है, लगता कोई मीर।भीतर-भीतर है छुपी, सबके कोई पीर।। हँसते चेहरों के तले, दर्दों की जागीर।बाहर सावन-सा
Read Moreनन्हे हाथ जब थाम लें,मिलता जग का मान।पापा संग हर मोड़ पर,खिल उठता अरमान॥ अँगुली पकड़ चलना सीख,सपनों को दे
Read More१नन्ही-नन्ही आँख में,सपनों का संसार।टैब संग सीख रहा,उज्ज्वल हो व्यवहार॥२मन लगाकर देखता,नई-नई हर बात।खेल-खेल में सीखता,जीवन की सौगात॥३जिज्ञासा की रोशनी,चमके
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