मस्ती की टोली
नन्हे-नन्हे पाँव में,
चंचलता की धूप।
घर-आँगन महका उठे,
हँसी बने स्वरूप॥
कूदें, नाचें, गुनगुनाएँ,
भरें खुशी के रंग।
भोले मन की खिलखिली,
सबसे प्यारा ढंग॥
छोटे-छोटे हाथ से,
बजती प्यारी तान।
मस्ती की हर एक लहर,
बनती नई उड़ान॥
भैया संग छोटा चले,
थामे खुशियाँ हाथ।
प्रेम भरे इन पगचिन्हों,
महके जीवन-पथ॥
हँसते-गाते बालपन,
सबसे अनुपम काल।
इनसे रोशन हो उठे,
घर का हर इक हाल॥
बचपन ईश्वर का दिया,
सबसे सुंदर दान।
इसकी निर्मल मुस्कान से,
खिल उठता जहान॥
— डॉक्टर सत्यवान सौरभ
