जब भी खोलूँ मैं अपने द्वार
जब भी खोलूँ खिड़की द्वार,दिखे नभ मेघ का प्रणय अपार। करते दोनो लुका छिपी,रहते मिल के हँसी खुशी। बादल के
Read Moreजब भी खोलूँ खिड़की द्वार,दिखे नभ मेघ का प्रणय अपार। करते दोनो लुका छिपी,रहते मिल के हँसी खुशी। बादल के
Read Moreक्यों मन मलिन तेरा सखेयाद किसी की आई है?बैठे हो सरि के कूल परया दिखती परछाई है। क्योंअचंभित हो गए
Read Moreकरती हूँ जिससे मैं अपने मन की बातें,वो एक रफ कॉपी अरु ढेर सारी किताबें। उस रफ कॉपी के पन्नों
Read Moreजहाँ हमारी सीमाओं पर तुम जैसे हों प्रहरी,नहीं किसी में है हिम्मत जो लाँघ सके है देहरी। जल थल नभ
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