गीतिका
कहीं नही मन लगता है अब,टूटा क्यों सपना सभी गैर लगते हैं अब क्यों, कोई नही अपना मन में खोट
Read Moreशब्द मौन हैं व्यथा देखकर,धरती का उजड़ा श्रृंगार बंजर हो गई भूमि अपनी,उगे वनो पर करे प्रहार, मानव की सुविधा
Read Moreमैं नदिया हूँ,चंचल हूँ मैं करती हूँ मनमानी शीतलता देता है मेरा निर्मल बहता पानी हर तरंग मदमस्त उछलती लहरो
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