उपन्यास : शान्तिदूत (अड़तालीसवीं कड़ी)
कुंती की बात सुनकर कृष्ण सोच में पड़ गये। उस संभावित युद्ध में कर्ण और अर्जुन का संग्राम होना एक
Read Moreकुंती की बात सुनकर कृष्ण सोच में पड़ गये। उस संभावित युद्ध में कर्ण और अर्जुन का संग्राम होना एक
Read Moreकृष्ण प्रश्नवाचक नेत्रों से सीधे कुंती की ओर देख रहे थे और अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे
Read Moreएकांत होते ही कुंती के मन में वे प्रश्न उभर आये जिनको वे कृष्ण से पूछना चाहती थीं- ‘गोविन्द, युद्ध
Read Moreअतिथि निवास में आकर कृष्ण ने सात्यकि को राजसभा की कार्यवाही संक्षेप में समझाई, यद्यपि उसकी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि
Read Moreजब विदुर दुर्योधन को राजसभा में वापस लेकर आये, तब भी वह क्रोध से कांप रहा था। विदुर ने धृतराष्ट्र
Read Moreदुर्योधन के अशिष्टतापूर्वक राजसभा कक्ष से बाहर चले जाने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। यह उसकी जिन्दगी में पहला
Read Moreप्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में प्रारंभ से अभी तक वामपंथियों का वर्चस्व रहा है. बहुत प्रयासों के बाद भी राष्ट्रवादी
Read Moreदुर्योधन का दो टूक उत्तर सुनकर कृष्ण बहुत निराश हुए। उनका धैर्य भी समाप्त हो गया। दुर्योधन को समझाने के
Read Moreराजसभा में सर्वत्र मौन छाया था। भीष्म और द्रोण तक का तिरस्कार करने वाले युवराज दुर्योधन के सामने फिर किसी
Read Moreअब कृष्ण ने महाराज धृतराष्ट्र की ओर मुख किया। वे अपनी अंधी आंखों की पुतलियों को ऊपर चढ़ाये हुए राजसभा
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