स्मृति के पंख – 5
बैसाखी का दिन था, मरदान के पास डेरा बाबा कर्मसिंह पर मेला लगता था। भ्राताजी और कुछ साथी मेला देखने
Read Moreबैसाखी का दिन था, मरदान के पास डेरा बाबा कर्मसिंह पर मेला लगता था। भ्राताजी और कुछ साथी मेला देखने
Read More26.10.1990 (शुक्रवार) आज हमारा टोकियो में अन्तिम दिन था। मेरी उड़ान इटालियन एयर लाइन्स अलइटालिया के साथ बुक थी, जो
Read Moreएक दिन पड़ोस में गन्दम (गेहूँ की एक किस्म) पिसवाने के लिए चक्की पर देने के लिए गया। हम 10-12
Read Moreवहाँ से श्री हिरानो मेरे लिए हीयरिंग रोड दिलवाने एक जगह ले गये जिसे इलैक्ट्रिकल सिटी (बिजली का नजर) कहा
Read Moreयात्रा बहुत अच्छी रही। अब हम घर वापिस पहुँच गए। कुछ दिन दुकान को बनाने संवारने में लगे। फिर से
Read Moreजापान में पहली बार मैं रेल में तब चढ़ा जब हमें तुकूबा जाना था। करीब 11 बजे हम रेलवे स्टेशन
Read Moreपूजनीय पिताजी का नियम था सुबह तीन बजे उठना, नजदीक ही गाँव में नदी थी, वहाँ स्नान करने जाना, वहाँ
Read Moreएन.टी.टी. की विलक्षण खोजें देखकर ही हमने बस नहीं की, बल्कि अभी और भी चमत्कार देखने थे। उसी का एक
Read Moreमाँ सरस्वती देवी को बारम्बार प्रणाम करता हूँ। माँ ! मुझे बुद्धि और शक्ति दे ताकि मैं अपनी जीवन गाथा
Read Moreबस ने हमें वहाँ उतारा जहाँ ‘डाटा शो’ नामक प्रदर्शनी लगी थी। उस दिन प्रदर्शनी का उद्घाटन था, जो 10
Read More