मोहन काका,साइकिल और वो बीस का नोट
बात उन दिनों की है जब कैलेंडर के पन्ने साल 1982 पर ठहरे हुए थे। मैं श्री नीलकंठेश्वर महाविद्यालय, खंडवा
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Read Moreकॉलेज का पहला दिन आज भी याद है। नए चेहरे, नई कक्षाएँ और दिल में अनगिनत सपने। शुरुआत में सब
Read Moreशिक्षकीय जीवन में प्रतिदिन न जाने कितने चेहरे सामने आते हैं। कुछ चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं,
Read Moreसाहित्यिक पटलों के माध्यम से संपर्क में आने और महज दो-तीन बार के आभासी संवाद के बाद नीलिमा ने राज
Read Moreकवि सम्मेलन की नामचीन हस्तियांश्री शैल चतुर्वेदी औरश्री बशीर बद्रशैल जी का आग्रहवाणी वंदना के बाद मुझे पढ़ाएंसंचालक डॉक्टर सतीश
Read More.. और अपने हिस्से की सारी तकनीकी पढ़ाई समाप्त कर लेने के बाद भी जब कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं मिला तब
Read Moreशिक्षकीय जीवन में प्रतिदिन न जाने कितने चेहरे सामने आते हैं। कुछ चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं,
Read Moreबहुत साल हो गया गुरु जी को हमने याद नहीं किया। और गुरु जी को भी हम कहां याद रहे
Read Moreक्या खूबसूरत विषय दिया है- ‘ वो भी क्या दिन थे- बिजली गुल और छत पर मेला’. सचमुच वो दिन
Read Moreमै आम बोल चाल की भाषा में लिखता हूँ। ठेठ लोकभाषा से सजी हुई रचनायें होती है। आम जनमानस में
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