लघुकथा

सच्चा सौदा

शाम के छः बजे रमनलाल जी के घर के सामने श्वानों की लाइन लगी है. अच्छे विद्यार्थियों की भांति पूरी तरह से अनुशासित खड़े हैं सभी श्वान. अपनी बारी आने पर रमनलाल श्वान को चोला पहनाता है. वह चला जाता है और शांति से अगला श्वान चोला पहनने के लिए प्रस्तुत होता है. रमनलाल अपनी […]

लघुकथा

खुला दरवाजा

दामिनी शर्मा एक ऐसा नाम जिसे लोग बहुत सम्मान से लेते थे ।  निर्भीक, निडर और स्पष्ट बोलने वाली  सबकी प्रिय एक रुतबा था उनका । परिवार को बहुत ही प्यार से और  करीने से सींचा था । सीमित संसाधनों में अपने बच्चों के साथ साथ  परिवार के अन्य बच्चों को भी अपने पास रख […]

लघुकथा

माँ की कृपा

अंकित बड़ी मुश्किल से पाँच छ: वर्ष का होगा । दो बहनों का भाई। अभी बचपन में ही था । पढाई से बेफ्रिक बस दिन भर मौज- मस्ती में मस्त। दादा-दादी का राज दुलारा और बहनों का भी बेहद प्यारा । बुआ कविता तो उसे अपनी जान से भी अधिक प्यार करती थी । निस्संदेह […]

लघुकथा

लघुकथा – कम्बल वितरण

बहुत बड़ा और सुंदर मंच सजा हुआ था । मंच के डेकोरेशन से ही पता चल रहा था कि मंच पर ही लाखों का व्यय किया गया है । काजू, बादाम, पिस्ता की प्लेटों के सामने क्षेत्रीय विधायक, सांसद, अध्यक्ष और सत्ताधारी पार्टी के तमाम फध्यक्ष मंच की शोभा बड़ा रहे थे । इसके साथ […]

लघुकथा

अमीर

“मिंटू, आ हमारे साथ सतौलिया खेल.” नवीन ने आमंत्रित किया. “सतौलिया! वो क्या होता है?” “अरे यही जो हम खेल रहे हैं बुद्धू! पत्थर के ऊपर पत्थर, पत्थर के नीचे पत्थर, फिर बॉल से दे धड़ाम नीचे वाले पत्थर को और फिर भाग, जमा पत्थर के ऊपर पत्थर और जीत! तेरा मन नहीं करता खेलने […]

लघुकथा

ऊंची पतंग

एयरपोर्ट पर दिविशा को विदा करने के बाद उसके माता-पिता पुनः लॉबी में बैठकर फ्लाइट जाने की प्रतीक्षा करने लगे. वे अचल थे, लेकिन विचारों को चलायमान होने से कैसे रोका जा सकता है! पिताजी तो अपने मोबाइल में मगन हो गए, लेकिन मां का मन दिविशा के, बल्कि अपने बचपन तक पहुंच गया. “मैं […]

लघुकथा

डायरी का आखिरी पन्ना

आज मुझे “अंतर्राष्ट्रीय सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता” के प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया जाना था. हर्ष मिश्रित आश्चर्य के साथ पुरस्कार लेने जा रहा था, लेकिन मेरे मन का पंछी अतीत के झरोखे में विचरण करने लगा. बहुत बड़ी लॉटरी लगी थी मेरी और मैं बचपन से संजोए स्वप्न को साकार करने विश्व-भ्रमण पर निकल पड़ा […]

लघुकथा

स्थान

 शाम के धुंधलके में दरवाजे पर कोई साया नजर आया बाबुलालजी अपना चश्मा पहनते हुए पूछा “कौन है दरवाजे पर?” मोहित ने अन्दर आते हुए कहा “सर मैं हूं मोहित !” “कौन मोहित?” “सर मैं आपका स्टूडेंट् हूं!” “अच्छा -अच्छा ” बाबूलालजी ने कुछ सोचते हुए कहा। “मोहित थोड़ा बैठक की लाईट जला देना !” […]

लघुकथा

लघुकथा : सम्पन्नता

जब तक माँ थी: “यह माँ भी ना! जो भी घर आता है, उसे कुछ न कुछ दे कर ही भेजती हैं। चाहे रिश्तेदार हो या मांगने वाला।” गुस्से में नेहा बोली। “अब तो मैं भी थक चुका हूं। समझती ही नहीं कि पैसा लुटाने से घर में संपन्नता नहीं आती।” सुर में सुर मिलाते […]

कथा साहित्य लघुकथा

झूठ

“अजीब किस्म के इंसान हैं आप। किस उम्र के व्यक्ति को क्या संबोधन करना है, ये कॉमन-सेंस भी आपको नहीं पता।” “नाराज क्यों हो रही हो डॉर्लिंग। आपको ऐसा क्यों लगता  है ?” “बड़ा ही अजीब-सा लगता है आपको अपनी दादी और दादाजी की उम्र के लोगों को दीदी और भैया कहते हुए देखकर। सामने […]