क्या तुम्हें याद है?
इलाका पहाड़ी था,कोहरे और धुंध की चादर ओढ़े ऊँचे-ऊँचे पाकीज़ा दरख़्त, आसमान से बातें करती चोटियाँ, और घुमावदार रास्तों पर
Read Moreइलाका पहाड़ी था,कोहरे और धुंध की चादर ओढ़े ऊँचे-ऊँचे पाकीज़ा दरख़्त, आसमान से बातें करती चोटियाँ, और घुमावदार रास्तों पर
Read Moreजून की तपती दोपहर हो या जुलाई की उमस भरी शाम, सुनील का पूरा दिन सीढ़ी पर ही बीतता था।
Read More‘‘मुझे तो वह सब याद भी नहीं था, पर प्रदीप ने कहा तब मुझे सब याद आ गया। मैं तो
Read Moreभीषण गर्मी की वह दोपहर थी। अपने शहर के छोटे-से रेलवे स्टेशन तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगने लगा था, जैसे सूरज
Read Moreगाड़ी के रुकते ही धुएँ का एक भारी गुबार खिड़की के टूटे हुए शीशे से अंदर दाखिल हुआ। बस के
Read Moreशादी के सात दिन बीत चुके थे, लेकिन घर के आँगन में अभी भी हल्दी और गेंदे के फूलों की
Read Moreतलाश का आगाज़ एक छोटा सा लड़का था—आरव। उसकी आँखों में दुनिया को देखने की एक अजीब सी बेताबी थी।
Read Moreरात भर आसमान चीखते- चीखते सो चुका था। धरती पर फैले रूधिर रक्त ने उसका रंग बदल दिया था। सूरज
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