क़मीज़ का वो गुलाबी रंग
शाम का सहर तारी था, और कमरे में रखी पुरानी मेज़ लैंप की धीमी रोशनी में नहाई हुई थी। अनवर,
Read Moreशाम का सहर तारी था, और कमरे में रखी पुरानी मेज़ लैंप की धीमी रोशनी में नहाई हुई थी। अनवर,
Read Moreशाम का वक्त था और पार्क के सुनहरी साए लंबे हो रहे थे। हवा में एक अजीब सा उदास सुकून
Read Moreशाम का वक्त था, कमरे में मद्धम रोशनी जल रही थी। मेज़ पर अबू की पुरानी डायरी रखी थी, जिसके
Read Moreवह सुनहरी दोपहर थी जब दफ़्तर में दाख़िल हुआ और काग़ज़ पर नज़र डाली, तो पलट कर देखा कि सामने
Read Moreसन 1930 के दशक की शुरुआत का समय था। चटगांव के आसमान पर अक्सर घने काले बादल छाए रहते थे।
Read Moreगांव का नाम था नरसिंहपुर। गांव के आखिरी छोर पर, टूटे हुए कुएं और बरगद के पेड़ के पास एक
Read Moreआज सुबह से ही दिल बड़ी जोर से धड़क रहा था ना जाने क्यों ? रह रह कर तुम्हारा चेहरा
Read Moreपति की मृत्यु के बाद शिला ने कारोबार का सारा बोझ अपने सिर ले लिया। आखिर करती भी क्या, पेट
Read Moreमैं उस दिन स्कूल में बतौर परीक्षक-इम्तिहान मौजूद था। स्कूल के हॉल में ख़ामोशी का राज़ था, सिर्फ़ क़लम के
Read Moreमैं अपने बीमार और वृद्ध पिता को काशी के मुक्ति भवन ले जा रहा था। मन में एक ही उम्मीद
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