लघु उपन्यास : करवट (पांचवीं क़िस्त)
खाना खाकर मानसी ने अपने बच्चों के साथ ही सोने को कहा, तो रामकुमार को बड़ा ही अटपटा सा लगा। उसने
Read Moreखाना खाकर मानसी ने अपने बच्चों के साथ ही सोने को कहा, तो रामकुमार को बड़ा ही अटपटा सा लगा। उसने
Read Moreकृष्ण की यह बात सुनकर धृतराष्ट्र भीतर तक कांप गये। तब तक विदुर के अलावा किसी ने उनको यह बताने
Read Moreदुर्योधन की यह गर्वोक्ति सुनकर कृष्ण क्रोधित नहीं हुए, बल्कि दयनीय दृष्टि से दुर्योधन की ओर देखा और मंद-मंद मुस्कराते हुए
Read Moreठाकुर साहब ने कहा कि शहर में पहुँच कर मानसी बुआ के यहां इन्द्रानगर में चले जाना और वहाँ पहुँचने के
Read Moreबोलने के लिए अवसर मिलते ही कृष्ण ने महाराज को सम्बोधित करके किन्तु राजसभा की ओर मुख करके कहना प्रारम्भ
Read Moreकृष्ण के आने से पहले ही राजसभा में सभी लोग उपस्थित हो गये थे और अपने-अपने स्थान पर बैठे थे।
Read Moreअगली सुबह रमुआ को लेकर धनुवा दीवानपुर प्राइमरी पाठशाला पर पहँुचा तो प्रधानाचार्य तिवारी जी से सीधे बात हुई। तिवारी जी
Read Moreअगले दिन प्रातःकाल कृष्ण और सात्यकि नित्यकर्मों से निवृत्त हुए। फिर राजसभा में जाने के लिए तैयार होने लगे। वहां
Read Moreरधिया ने चार आलू काटकर, दो प्याज की महीन फाँकें काटकर कराही में छौंक लगा दी और दूसरी तरफ चूल्हे
Read Moreअतिथि शाला में सात्यकि और अपने सारथी के निवास की व्यवस्था देखकर कृष्ण अकेले ही अपनी बुआ कुंती से मिलने
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