सामाजिक

त्योहार और बाजार

कहते हैं बाजार में वो ताकत हैं जिसकी दूरदर्शी आंखे हर अवसर को भुना कर मोटा मुनाफा कमाने में सक्षम हैं। महंगे प्राइवेट स्कूल, क्रिकेट , शीतल पेयजल व मॉल से लेकर फ्लैट संस्कृति तक इसी बाजार की उपज है। बाजार ने इनकी उपयोगिता व संभावनाओं को बहुत पहले पहचान लिया और नियोजित तरीके से […]

कविता

भारत के सपूतों की ललकार !

हां पाला है सांपों को मैंने, दंश भी मैंने झैले हैं। मेरी ही छाती पर हरदम क्यों दुश्मन के मैले हैं। जिनके 56 देश बसे हैं, वो मेरे घर क्यों आते हैं? आकर मेरी धरती पर क्यों अपनी नाक कटाते हैं? देश को असहिष्णु कहने वाले, क्यों अपने घर ना जाते हैं? अब में भगवा […]

गीतिका/ग़ज़ल

” –——————————- कांटों पे लेटे हैं ” !!

  फौज यहां लड़ती है , नेता श्रेय लेते हैं ! शीश जहां झुकना हो , मुंह को फेर लेते हैं !! विरोधी विरोध करे , मूंछें तानें सरकारें ! सर्जिकल स्ट्राइक को , हम सलाम देते हैं !! फूलों से नाज़ुक नहीं , खेलते अंगारों से ! सीने पे खा गोलियां , जान यों […]

मुक्तक/दोहा

“दोहा मुक्तक”

यह तो प्रति हुंकार है, नव दिन का संग्राम। रावण को मूर्छा हुई, मेघनाथ सुर धाम। मंदोदरी महान थी, किया अहं आगाह- कुंभकर्ण फिर सो गए, घर विभीषण राम॥-1 यह दिन दश इतिहास है, विजय पर्व के नाम। माँ सीता की वाटिका, लखन पवन श्रीराम। सेतु बंध रामेश्वरम, शिव मय राम महान- लंका नगरी राक्षसी, […]

गीतिका/ग़ज़ल

यही है जिंदगी

त्याग ,प्यार ,स्नेह ,परहित की भावना । निश्छल प्रेम की है अद्रश्य याचना । थक जाते हैं कदम भी अनजानी दौड़ में , कहाँ है पवित्र प्रेम की सहज सी उपासना । तन्हाई पीड़ा अवसाद है आज की प्रवंचना मात्र दैहिक ही तो है प्यार की अवचेतना ।। तेज पानी का प्रवाह भी दे जाता […]

उपन्यास अंश

इंसानियत – एक धर्म ( भाग – सैंतीसवां )

असलम ने रजिया के हाथ से पानी का गिलास थामते हुए रहमान चाचा की तरफ देखा । उनके चेहरे के भाव बदले हुए थे । वह उनके चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश करते हुए पानी पीने लगा । अचानक रहमान चाचा की गंभीर आवाज फिजां में गूंज उठी ” तुम सही कह रहे […]

कुण्डली/छंद

सरसी छंद

1 – वाह वाह ही सब करते हैं ,कविता हुई फरार | फेसबुक ने दिया है सबको ,कैसा यह संसार || अपने मन की लिखते हैं सब , नहीं छंद का नाम| जाने कैसे बिक जाते हैं , बिन सुगंध के आम || 2 – झूठी शान कमाने खातिर ,ठगे गए कवि लोग | कविता […]

लघुकथा

अष्टमी

अष्टमी (लघु कथा ) दिव्या पुलिस स्टेशन खड़ी थी। मेट्रो स्टेशन पर मनोज ने उसके साथ बदतमीज़ी की थी। अपने बयान में दिव्या ने बताया कि मनोज काफी देर तो उसे घूर रहा था और जब मेट्रो ट्रेन में प्रवेश हुआ तो उसके बाद जानबूझ कर अश्लील हरकतें कर रहा था। लिहाजा वहीं उसने मनोज […]

सामाजिक

महिलाएँ और भ्रूण हत्या

नारी के साथ जुड़ा शब्द ‘‘माँ’’ सारी सृष्टि को अपने अंक में समेटने की क्षमता रखता है। माँ सृष्टा है, जन्म दात्री है, ममता और दुलार का भण्डार है, किन्तु इसी ममता की छाँव के साथ जब हत्या जैसा क्रूर शब्द जुड़ जाता है (वह भी भ्रूण हत्या) तो अनजाने, अनचाहे मुँह का स्वाद कसैला […]

भाषा-साहित्य

यावज्जीवम् अधीते विप्रः

यावज्जीवम् अधीते विप्रः अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति जीवन भर अध्ययन करता है।  ऊपर दिया गया कथन प्राचीन ऋषियों की प्रसिद्ध उक्ति है जो उनकी जीवन – दृष्टि का परिचायक है। मनुष्य और पशु में सबसे बड़ा अंतर उनके सीखने की क्षमता का है। कितना ही प्रयास क्यों न करें , पशुओं को हम एक सीमा से आगे […]