पर्यावरण

उत्तराखंड मे फिर कुदरत ने बरसाया कहर

भारत देश के अंतर्गत आने वाला उत्तराखंड भारत की धरा पर एक स्वर्ग सा प्रतित होता है।यहां के सौंदर्यता का जितना भी वर्णन किया जाऐ कम है।उत्तराखंड मे ही स्थित देख का गौरव हिमालय हमारे देश निरंतर एक पहरेदार की तरह अडिंग हो जैसे रक्षा करता से देश की सीमा के बाहर रह रहे शत्रुओं से,यहां उपलब्ध बेशुमार सौंदर्यता से परिपूर्ण पहाड़ो और उन पर स्थित घनी पर्यावरण की प्राकृतिक छटा ने उत्तराखंड की खूबसूरती मे जैसे चार चांद ही लगा दिये हों।उत्तराखंड के ही पहाड़ों मे पाई जाने वाली अपार जड़िबूटियां जो की हमारे लिये कई तरह की औषधियां बनाने के काम आती है।इनह़ी जड़ीबूटियों के लिये भी उत्तराखंड जाना जाता है।हर साल लाखों सैलानी उत्तराखंड आते और हमारे देश की एक बहुत बड़ी आमदनी का हिस्सा हम इसी उत्तराखंड की भूमि से ही पाते हैं।
    जहां एक ओर हमारा उत्तराखंड भारत की शान,धरती का स्वर्ग कहा जाता है वही दूसरी ओर ये क्या यहां लगभग कुछ सालो के अंतराल मे होने वाले ये कैसे भयावह प्राकृतिक हादसे हो रहे हैं?ऐसे प्राकृतिक हादसे जो अचानक इतना बढ़ा प्रलय ला देते की किसी को संभलने तक का मौका भी नहीं मिल पाता है।ये हादसे अचानक हो हजारों लोगों को अपनी चपेटे मे लेके लील लेती है।किसी को नहीं बख्शता ये प्राकृतिक हादसा ये भी ना देखता की कौन अमीर और कौन गरीब,कौन उत्तराखंड का वासी और कौन सैलानी बस इस प्राकृतिक हादसे की राह मे जो कोई भी आता जाता है उसे अपना निवाला बनाते हुऐ प्रलय का पताका लहराते हुए आगे बढ़ता ही जाता है।जब तक प्राकृतिक हादसों मे हजारों को लील ना लेती तब तक जैसे इसका क्रोध शांत नहीं होने पाता है।
     2004 मे बद्रीनाथ मे भी इसी तरह के आऐ प्रलय ने हजारों की ताद़ाद मे लील लिया था लोगों को।तब कितने ही लोग जो कि तीर्थ यात्रा पर आऐ थे वहीं प्रभु की श्री चरणों मे स्थान लिये हमेशा के लिये सो गये।उसी तरह हजारों सैलानी 2013 मे भी प्रलय का शिकार हो गये किस तरह लोग अपने मनोरंजन के लिये परिवार संग खुशियों के पल बिताने आऐ और अपने परिवार को ही अपनी आंखों के सामनें भयावह मंज़र मे पानी मे बहते देखा,आज भी लाखों लोगों की की आंखें 2004 और 2013 के उस भयावह मंज़र को याद कर भीग जाती हैं,आज भी एक उम्मीद की लौ दिल मे जली हुई है कि हमारे अपने लौट आऐं,हमें फिर से मिल जाऐं।अभी ये पुराने जख़्म उत्तराखंड के वासियों के भर भी ना पाऐ थे कि फिर एक नया प्राकृतिक हादसा हो गया जिसनें फिर से भय उत्पन्न कर दिया लोगों के दिलों मे।फिर से वही भूखी प्राकृतिक आपदा अपनी भूख मिटाने के लिये हजारों लोगों को लील गई।फिर से वो बड़े पैमानें पर जन हानी आंखों मे आंसूं भर लाई।उत्तराखंड के प्राकृतिक हादसे ने वर्ष 2004 और 2013 के कहर की याद दिला दी।
     उत्तराखंड के चमोली मे जो आज ग्लेशियर अचानक आके टूटा ये बहुत ही बड़ी प्राकृतिक घटना है।आय दिन हमारे लिये दूरदर्शन या सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से हमें संदेश दिया जाता है कि वृषारोपण करें।परंतु हम भी आऐ दिन सुना अनसुना करते हुए प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते ही रहते हैं और आऐ दिन हो रहे ऐसे भयावह हादसों से रुबरु होते रहते हैं।जन हानी तो होती ही है ऐसे प्राकृतिक हादसों मे साथ ही धन हानी का तो अनुमान लगाना ही असंभव सा प्रतीत होने लगता है।अब आज की ही चमोली की घटना ली जाऐ तो इसमें कितनी धन हानी हुई है।पूरा का पूरा पुल का उखड़ जाना,पूरा का पूरा पावरप्लांट का बह जाना,आस पास के गांवों से संपर्क तक टूट गया है रास्ते तक बह गये इस हादसे मे साथ ही ताश के पत्तों की तरह रास्ते मे जो भी आता गया इस प्रलय उसे अपने साथ बहाते चली ले गयी।किसी को भी संभलनें का सोचने का तनिक भी मौका ना दिया कि आखिर हो क्या रहा है जब तक इंसान समझा तब तलक तो इंसान के लिये बहुत देर हो चुकी थी।इतनी बड़ी मात्रा मे जनहानि और धनहानि करने का जैसे प्रकृति ने निश्चय ही कर लिया है कि उसे कुछ वर्षों के अंतराल पर प्रलय लाना ही है।क्या इस तरह के प्राकृतिक हादसों को रोकने के लिये कोई भी तोड़ निकाल पाना असंभव है?क्या यूंही हमें प्रकृति को इ़सानों की बलियों देती रहनी पड़ेगी?क्या यूंही हमारे सरकारी कोष का बहुत बड़ा हिस्सा पुनः उत्तराखंड को विकसित करने के लिये खर्च करते रहना पड़ेगा?कब तक इस तरह की प्राकृतिक हादसों से इंसानों को रुबरु होते रहना पड़ेगा आखिर?
    अभी हमारा देश इतनी बड़ी महामारी कोरोना से भी मुक्त हो पाया था,कोरोना काल भी यूंही लाखों इंसानों को लील गया सबने उम्मीद लगाई थी कि जो 2020 मे इतनी त्रासदी,महामारी हुई है वो कभी भी फिर से देखने को नही मिले सबने सोचा था कि वर्ष 2021 सुखद,आनंदमयी,खुशियों से भरा हुआ ही होगा परंतु ये क्या वर्ष 2021 के शुरु के एक माह बितने पर ही दूसरे माह मे ही ऐसी भयावह खबर ने पूरे भारत वर्ष को दहला के रख दिया हो जैसे।सभी ओर हाहाकार के इसी मंज़र की वार्तालाप चल रही है आज जहां 2021 का माह जनवरी एक सुखद सूचना लाया वैक्सीन आने का,तो वहीं प्रकृति को ये सुखद सूचना नाग्वांर सी लगी और वर्ष के दूसरे माह मे ही सभी की खुशियों मे ग्रहण सा लगा दिया ।
  यदि यूंही उत्तराखंड मे प्रकृति अपना कौहराम प्रलय का मजंर ला दिखाते रहेगी और इसी तरह ये प्रकृति इतनी बड़ी तादाद मे इंसानों को लीलते रहेगी तो एक दिन ऐसा ना हो कि हमारे भारत देश का स्वर्ग कहलाने वाला उत्तराखंड सुनसान हो जाऐ,कहीं यहां आने वाले सैलानी उत्तराखंड के भयावह हादसों से इस कदर भयभीत हो जाऐं कि उत्तराखंड की ओर आने से भी डरे,कहीं ऐसा ना हो कि हमारे सरकारी कोष की आमदनी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो यहां के पहाड़ो पे पाऐ जाने वाली जड़ीबूटियों से होता है,सैलानियों से भी होता है वो आना बंद हो जाऐ हर यहां पर रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा बेरोज़गार हो जाऐ।ऐसा ना हो कि उत्तराखंड के रहवासी दूसरे राज्यों मे पलायन करना शुरु कर दे।होने को तो कुछ भी हो सकता हे,कुछ भी कहा नहीं जा सकता है,क्यों कि ये प्रकृति है और प्रकृति के आगे आज तक किसी का भी जोर ना चल पाया है और ना ही चल पाऐगा।बस सुझाव यही की वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाऐ।जितना हो सके पेड़ लगाइये अपने लालच,ऐशो-आराम के लिये सभी से विनती है कि पेड़ ना काटे,बल्कि समाज मे वृक्षारोपण के लिये जागृति लाऐं।अगर कोई भी आपके आस पास वृक्ष को काटता भी है तो आप अपनी ओर से भरपूर प्रयास करे उन्हें रोकने का और आऐ दिन हो रहे हर एक प्राकृतिक हादसों से अवगत भी कराऐं कि किस कदर प्रकृति भी इंसा को उनके गुनाह की सज़ा देती रहती है।किस कदर वो प्रचंड रुप लेके हजारों लोगों को लील जाती है,किस कदर धन-जन की बलि लेकर वो अपना क्रोध शांत करती है।
— वीना आडवानी

वीना आडवाणी तन्वी

गृहिणी साझा पुस्तक..Parents our life Memory लाकडाऊन के सकारात्मक प्रभाव दर्द-ए शायरा अवार्ड महफिल के सितारे त्रिवेणी काव्य शायरा अवार्ड प्रादेशिक समाचार पत्र 2020 का व्दितीय अवार्ड सर्वश्रेष्ठ रचनाकार अवार्ड भारतीय अखिल साहित्यिक हिन्दी संस्था मे हो रही प्रतियोगिता मे लगातार सात बार प्रथम स्थान प्राप्त।। आदि कई उपलबधियों से सम्मानित