संस्मरण

अतीत की अनुगूँज -12 : पूर्वाग्रहों के साथ-साथ

पिछले सत्तर वर्ष हमने देखे हैं।  हममे से कोई भी छाती पर हाथ धरकर यह नहीं कह सकता कि हमें होश संभालने के साथ साथ मुसलामानों, नौकरों, जमादारिन आदि के प्रति आदर सिखाया गया था।  ये बात और है कि वकील नियाज़ी साहब के आने पर पापा या बाबूजी अदब से खड़े होकर सलाम करते […]

संस्मरण

जन्म शताब्दी संस्मरण

इस वर्ष मेरे पूज्य पिता श्री लक्ष्मी चरण जी की जन्म शताब्दी है।  पापाजी अत्यंत मेधावी व्यक्ति थे।  अपने स्वभाव में वह अतिशय उदार एवं सकारात्मक सोंच रखते थे।  उनके निकट जो भी कभी आया था उनको वर्षों के बाद भी याद करता है।  इस अवसर पर मैं उनके जीवन से जुड़े कुछ तथ्य उल्लिखित कर […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूंज – १० : नैंसी का परिवार

सितम्बर में नया सत्र शुरू हुआ।  उस वर्ष मुझे पहली कक्षा को पढ़ाना था।  रंगा रंगी बच्चे। सब एक उम्र के मगर कोई समानता नहीं उनमे।  ३० में से दस बच्चे गोरे  अवश्य कहे जाएंगे मगर सबके माँ बाप अलग अलग देशों की खुरचन। अब कोई भूखा नंगा तो है नहीं इंग्लैंड में जो आप […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूंज -9 : लंदन में पहली दीवाली

मेरी स्मृतियों के  अमित  पिटारे में एक बहुत प्रिय संयोग है जिसे याद करके आज भी आत्मा तृप्त हो जाती है।  सं १९७५ के जनवरी मास  में  मैंने भारत छोड़ा। पति देव पहले ही आ चुके थे। दो बड़े बच्चों को उनकी शिक्षा के कारण वहीँ पर छोड़ना पड़ा। मेरी माँ ने उनको आने ही नहीं […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूंज – 8 : अभागा बचपन

उस वर्ष प्ले ग्राउंड का सबसे शरारती बच्चा था एडवर्ड। बेहद सुन्दर , काले घुंघराले बाल। गोरा रंग और चमकती चंचल आँखें। बात बात पर उसकी किसी न किसी से मुठभेड़ हो जाती। हरदम मैं उसको ऑफिस के बाहर सज़ा में बैठा हुआ पाती।  जब लंच की छुट्टी ख़तम होती तब उसको क्लास में वापिस […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूँज – 7 : केतुल क्यों पिछड़ा

        भारतीय समाज में काश्मीर से लगाकर कन्याकुमारी तक ,हर माँ या दादी या नानी नन्हें बच्चों को खूब लाड से ,गाने सुना कर ,कहानियां सुनाकर , खेल खेल में रिझा कर खाना खिलाती हैं।  करीब दो वर्ष तक की आयु तक यह सब बेहद संतोष प्रदान करता है।  बच्चा और माँ दोनों […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूंज – 6 : ब्रेकफास्ट

सुबह बिली रॉस जल्दी आ गया। मगर पीछे पीछे उसकी माँ उसका बस्ता लेकर गुस्से से लाल होती ,आ धमकी।              ” खा खा के दो हाथ ऊँचा हो गया है।  तेरा बस्ता मुझे लाना पड़ा। ” शायद उसका इरादा बालक को मारने का था मगर मुझको वहां देखकर वह […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूंज – ५ : किस्सा काले शेर का

भारत से पलायन कुछ आकस्मिक था।  तब मेरे बच्चे बहुत छोटे थे।  बड़ा बेटा मनु सात बरस का था। दो बेटियां गौरी और राधा  क्रमशः साढ़े तीन वर्ष और ढाई वर्ष की थीं।  बड़े दोनों स्कूल जाते थे।  लखनऊ के कॉल्विन ताल्लुकेदार में दाखिला मिलना कठिन होता था।  अतः माँ ने कहा कि जबतक घर […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूँज – 4 : आचार सहिंता

 बाह्य जगत की अनुभवहीनता से बच्चे किसी तरह संधि कर सकते हैं परन्तु जब सवाल अंतर्दृष्टि का आता है तब जो झंझावात मन मस्तिष्क में उपद्रव करता है उसको झेलना कठिनतम कार्य है।  मॉरल डिलेमा जिसे अंग्रेजी में कहा जाता है , बहुत मारक  होता है।        हमारी कोठी में सड़क की तरफ […]

संस्मरण

अतीत की अनुगूंज – ३ : नॉत्रे दाम में

आज से सात दिन पूर्व ,१५ अप्रैल ,२०१९  का दिन विश्व इतिहास का एक काला दिन कहा जायेगा।  पेरिस का नॉत्रे दाम  चर्च भीषण अग्नि कांड में ध्वस्त हो गया।  सैकड़ों अग्निशामक अपनी अटूट मेहनत और साहस के साथ रात दिन आग बुझाने में लगे रहे परन्तु फिर  भी चर्च के प्रमुख प्रासाद को बचा […]