गीतिका/ग़ज़ल

वक्त के हाथों पिटे

वक़्त के हाथो पिटे शतरंज के मोहरे हैं हम खेल जब तक हो न अगला बेसबब हैं क्या करें स्वतः उगते हैं किसी वट वृक्ष पर आश्रित नहीं इस लिये इस दौर में हम बेअदब हैँ क्या करें गैर के तप से मिले देवत्व इस अरमान में इस दशा में वो अधर के बीच अब […]

गीतिका/ग़ज़ल

भूखा हिंदुस्तान लिखा

हमने तो अपने नगमो में दिल का सहज बयान लिखा कभी लिखी बेबस की पीड़ा और कभी तूफ़ान लिखा जात धरम मज़हब की बातें सब की सब बेमानी हैं जब तक कहीं किसी भी घर में भूखा हिंदुस्तान लिखा आँसू पानी काज़ल स्याही कागज दिल के वरक सभी हर इंसान यही कहता है उफ़ कितना […]

गीतिका/ग़ज़ल

समस्त नई पीढ़ी को समर्पित

ये दिन तुम पर भी आयेंगे अपनी पारी तुम समझो वृद्ध पिता की बूढी माँ की जिम्मेदारी   तुम समझो तुम्हे खिलाया गोद बिठा कर काँधे दुनिया दिखलाई क्यों अब हम तुम पर हैं भारी  क्या दुश्वारी  तुम समझो सारा जीवन देते आये कभी न झोली फैलाई क्यों चाहिए हमको अपनापन ये खुद्दारी  तुम समझो पथराई सूनी आँखों में […]

गीतिका/ग़ज़ल

अहिल्या की पीड़ा

जैसे तैसे जल रहे हैं अब तलक हमसे दिये यातनाओं के शिविर में कब तलक कोई जिये था अहम  मुनि का कि वो दुर्भावना थी इंद्र की हम जिसे पत्थर बने सदियों यूं ही भोगा किये प्यास बढ़ती जा रही है द्रोपदी के चीर सी उम्र का प्याला है खाली आदमी कैसे पिये टुकड़ा टुकड़ा […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हादसों पर हादसे होते रहे फिर भी हम ये जिंदगी ढोते रहे किस तरह मिलती उन्हे अमराइयाँ जो बबूलों की फसल बोते रहें कोहरे में कैद जब सूरज हुआ दोपहर तक लोग सब सोते रहे यातना हालात या कहिये नियति आप तो हल मेँ हमें जोते रहे देखकर झरनो में बहने की अदा बेसबब हम […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

खंड खंड आकाश देखिए रिश्तो का संत्रास देखिए रक्त जनित सारे रिश्तो में दरक रहा विश्वास देखिए भाई की जड भाई काटता करता है उपहास देखिए भावुक मन निरद्वंद भटकता रहता सदा निराश देखिए जाने कब तक छुट्टी पर हैं खुशियों का अवकाश देखिए कोशिश अपनी फिर भी जारी करते सतत प्रयास देखिए कैसे इससे […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका – शाख से टूटे हुए पत्ते

शाख से टूटे हुए पत्ते बताते हैं व्यथा कल हमारे दम से रौनक थी इसी गुलजार में और सूखे फूल भी कहते हैं अपनी दास्तां हम बहुत महंगे बिके थे कल इसी बाजार में था कोई पुरनूर चेहरा भी हमारी बज्म में तय है छप जाएगा यह भी एक दिन अखबार में दोस्तों इस गलतफहमी […]

गीत/नवगीत

आ गया हूँ द्वार तेरे

आ गया हूँ द्वार तेरे माँ स्वयं से हार कर याचना है बस यही विनती मेरी स्वीकार कर कोटि अरि मुंडो की माला तुझको अर्पित कर सकूँ शारदे माँ इस कलम की धार को तलवार कर जब तलक है प्राण तन में राष्ट्र ध्वज झुकने न दूँ देश द्रोही इस धरा पर एक भी रुकने […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

वो लोग जिनके लिये  हमने गुल खिलाये थे मेरी  मज़ार   पे    लेकर    कुदाल   आये  थे वहाँ   तो     दूर तलक   धूप  का समंदर है दरख्त   हमने   जहाँ   उम्र   भर   लगाये थे उसी ने   बढ़  के मेरे  जिस्म पे कीलें   ठोंकी सलीब  सारी उमर  जिसकी   हम उठाये  थे अँधेरी रात में   दामन   छुड़ा   गये  […]