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  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    हादसों पर हादसे होते रहे फिर भी हम ये जिंदगी ढोते रहे किस तरह मिलती उन्हे अमराइयाँ जो बबूलों की फसल बोते रहें कोहरे में कैद जब सूरज हुआ दोपहर तक लोग सब सोते रहे यातना...

  • गीतिका

    गीतिका

    खंड खंड आकाश देखिए रिश्तो का संत्रास देखिए रक्त जनित सारे रिश्तो में दरक रहा विश्वास देखिए भाई की जड भाई काटता करता है उपहास देखिए भावुक मन निरद्वंद भटकता रहता सदा निराश देखिए जाने कब...



  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    वो लोग जिनके लिये  हमने गुल खिलाये थे मेरी  मज़ार   पे    लेकर    कुदाल   आये  थे वहाँ   तो     दूर तलक   धूप  का समंदर है दरख्त   हमने   जहाँ   उम्र   भर   लगाये थे उसी ने   बढ़ ...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    द्वेष की खाई न क्यों कर पाटते हैं और सदा सत्ता के तलवे चाटते हैं हो ना अर्जुन सा धनुर्धर दूसरा भी एकलव्यों के अंगूठे काटते हैं — मनोज श्रीवास्तव परिचय - मनोज श्रीवास्तव 1 -मनोज...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    लाठी है बुढ़ापे की छुड़ाने पे तुले हैं हुंडी करम सारे भुनाने पर तुले हैं तय है दिन ये आएंगे उन पर भी यकीनन मां बाप को जो अपने सताने पे तुले हैं — डॉ मनोज...