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  • एहसास

    एहसास

    पहली बार मिले थे ,तब मैं तुम्हें बस देखता रहा उस समय मेरा ख्याल था, कि तुम्हें मैं अपनी आंखों में छुपा लूं बड़ी मुद्दतों और बड़ी कोशिशों के बाद मैं मिला तुमसे दोबारा अबकी बार...

  • नींद

    नींद

    नींद उचट गई है , बारिश की बूंदे भीनी भीनी आसमान से छिटक रही है सवाल था बूंदों से मेरी नींद में खलल क्यों डाल दिया ? जज्बातों की हांडी में कुछ शब्द पक रहे थे...

  • पाठशाला

    पाठशाला

    छटपटाहट देखी सरकारी चोरों की कहने को अध्यापक कहलाते गरिबों का आटा तक खा जाते अध्यापन मात्र एक स्वप्न यहाँ फुला बैठा भ्रष्टाचार का सर्प जहाँ क्यों शिक्षा से गरिब आज भी वंचित है? क्या यही...

  • पिता

    पिता

    मेहनतकश को पूजता पसीने से सराबोर जब देखता है मुस्कुराहट अपने नौनिहाल की तो छिटक देता है पसीना माथे से उठाकर भूल जाता है सारी पीड़ाएं ,दर्द और ठोकरें जो उसने खाई है एक सुनहरा भविष्य...

  • होगा

    होगा

    खोल के रख दी है संदूक दिल की मेरे पास अब छुपा हुआ राज क्या होगा? मौत से हमदर्दी है मेरी बेवफा से नहीं जिंदगी फिर से, तो मेरा जवाब क्या होगा? कलम से पक्के किये...

  • ऊँचे

    ऊँचे

    ऊँची ईमारतें ऊँचे लोग जमीन पर रह गये बस भूखे लोग चढावा सोने-चांदी का अष्ट मिठाई का भोग पेड़ियों पर बैठे रहते लाचार, कुष्ठ रोग परिचय - परवीन माटी नाम -परवीन माटी गाँव- नौरंगाबाद डाकघर-बामला,भिवानी 127021...

  • बदल गया

    बदल गया

    लोग बदल गये हैं ,लोगों का मिजाज़ बदल गया है पैसा हर जख्म की दवाई,जीने का रिवाज बदल गया है सड़को पर बिलखता बचपन, शहरों का आकार बदल गया है मोल लग जाता है इंसा का...

  • मजदूर

    मजदूर

      बड़े-बड़े मंचों पर भाषण दिये बड़े-बड़े मजदूर दिवस पर मोटे-सूखे नेताओं ने पंडाल बनाते वक्त घायल मजबूर ने पत्नी और चार बच्चों के सामने ,जर्जर अस्पताल की इमारत में दवाइयों की कमी के कारण प्राण...

  • चाह

    चाह

    मेरी चाह बस इतनी सी है एक बार छू लूँँ बस एक बार जिंदगी तुझे बहुत सालों से दिखी नहीं है गरीब खाने में हाँ! एक दफा आई थी पहली किलकारी के साथ,फिर दिखी ही नहीं...

  • कुछ छः

    कुछ छः

    1. कौन-सा अपनापन जता रहे हो भाई साहेब !! मेरी पीठ का खून अब तक आपके हाथ पर है। 2. भीड़ बहुत है रिश्तों की,मगर सच्चाई से दूर। साथ दें बातें बस,उपहास होता देखते जरूर।। 3....