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  • षड्यंत्र

    षड्यंत्र

    सत्ता का षड्यंत्र जारी है अहम एक बड़ी बिमारी है हम तो रह गए भोले-भाले आँखों की पट्टी अभी उतारी है एक बात अब बैठ विचारी है फरैब झूठ ही अब अधिकारी है अब पढ़नी है...

  • यादों के सहारे

    यादों के सहारे

    यादों के सहारे पत्थरों की मुरत पत्थरों की मिनारें समंदर उफान भरता हुआ मैं, मौन धारण बैठा किनारे कुछ रास्तों में रूका था मैं एक बार नहीं! कई बार झुका था मैं अब संवेदनाएं महज धोखा...

  • कोई

    कोई

    इंतजार में गुजार दी रात अकेले छत पर कम से कम आये कोई लूट ली पतंग अपनों ने ही यहाँ मेरी डोर से मांझे लड़ाये कोई शहर की गलियों में गिर पड़ा बचपन जाकर माँ की...

  • बिकता नहीं

    बिकता नहीं

    बिकता नहीं मोहल्ले मेंये इंसान अखबारों की तरहासजता नहीं झूठे,फरेबीबाजारों की तरहाक्या हुआ जो अंधेरा घना हैमंजिल वाले रास्ते मेंटिमटिमाता जुगनूँ हूँचमकदार हूँ सितारों की तरहा परिचय - प्रवीण माटी नाम -प्रवीण माटी गाँव- नौरंगाबाद डाकघर-बामला,भिवानी...

  • इंतजार

    इंतजार

    जिंदगी गुजर रही ,सोच-सोचकर यही रात ये ढलेगी जब, खिलुँगा मैं फिर तभी जब चला मैं दो कदम,दिल मेरा यूँ कह गया इरादों का एक कारवां, अंतर्मन से बह गया थमा-थमा सा मैं रूका,वक्त के पड़ाव...

  • गरीबों के

    गरीबों के

    फाईलों में दब जाते हैं नाम गरीबों के कुचले जाते हैं इरादे तमाम गरीबो के पकड़ते हैं पैसे वाले हाथ गिरेबान गरीबों के बस कागज पर ही खड़े होते मकान गरीबों के मंच से घोषणाएं सून...

  • बदल जाते हैं

    बदल जाते हैं

      मौसम का क्या बदलना इधर लोग बदल जाते हैं बना कर तमाशा गली में लोग यूं ही निकल जाते हैं बुरा वक्त है या इरादें कुछ और पैसा देखकर लोग फिसल जाते हैं काट काट...

  • कब तक?

    कब तक?

      वो जिया भी गरीब वो मरा भी गरीब वह पीला भी गरीब वो हरा भी गरीब उसके हालात भी गरीब थे उसके जज्बात भी गरीब थे उसके पूर्वज भी गरीब थे उसकी आने वाली पीढ़ी...

  • भूख

    भूख

      भूखी है जिंदगी मेरी साहेब! कुदाल और कस्सी का वजन नहीं देखती अब ना मुड़के देखती है पीठ पर सरकते पसीने को भूखी है जिंदगी मेरी साहेब! मूक बधिर बना दिया है भूख ने मंचों...

  • पूछ रहा हूँ

    पूछ रहा हूँ

    पूछ रहा हूं सब से कि मैं ढूंढ रहा हूं खुद को कहां हूं मैं ? क्या मैं जीवित हूं !!! या मेरा शरीर शिथिल पड़ गया है पाषाण से बैठा कहीं ढूंढता हूं झुर्रियों भरे...