कविता

ख्वाब

सुर्यास्त और ध्यान मैं और ख्याल शब्द और उन्माद शांति और विवाद कुछ गुलाम और आजाद आहट और शोरगुल इशारे और भूल बचपना और धूल कुछ पहलू जिंदगी के अनछुए नलकूप ,पगडंडियां और कूएं महरबानी,षड्यंत्र और जाल मैं,अकेलापन और ख्याल  

कविता

एक माँ के बेटे चार

  संवेदनाएं नहीं है एक मां के बेटे चार कौन देगा रोटी अब हो रहा विचार झगड़ा हुआ रात भर बिना परिणाम सुबह नार ने किया सब बेकार एक मां के बेटा चार संवेदना बची कहां जब कोई सुनता नहीं मां है सबकी अब लेकिन कोई चुनता नहीं प्रलय आएगी वो सुन रहा है ऊपर […]

कविता

जी ले जीवन

अचेतना से निकलकर भविष्य की ओर झाँकती हुई नवस्फुटित कोंपलें जीवन की सार्थकता को परिभाषित कर रही है नर होकर भी निराश मन क्यों तेरी जिंदगी मुसीबतों से डर रही है थककर हार ना मान अंदर की जीवन शक्ति को पहचान बस चलते चलते चलते चल परिस्थितियों के दलदल से अब निकल घूम कर देख […]

कविता

सवाल

  परछाइयों के शहर में क्या मैं खुद को ढूंढ पाऊंगा ? एक दिल लेकर आया हूं तेरे पास क्या खाली हाथ यहां से जाऊंगा? देखा मैंने घूम कर यहां पर कोई राधा है कोई मीरा है मैं बैठा हूं राह तकता तुम्हारी मेरे पास सवालों का जखीरा है

कविता

जीवन

मिलो की दूरियां हैं दिल की खबरें आज भी पहुंचती हैं यह इश्क है जनाब किसी के कहने से कहा रूकती हैं जमाना कितनी भी पैरवी कर ले हुक्मरानों की अब जिस पर फल ज्यादा होते हैं ,डाली वही झुकती है आंधी और तूफान तो आते रहते हैं ,दुनिया हर कोने में रब के हाथ […]

कविता

फुटपाथ

जिंदगी के उतार-चढ़ाव दो पल खुशी,कुछ तनाव कठिन समय मौत का भय दो वक्त की रोटी काश! पास होती उसके लिए जद्दोजहद छोटी नहीं अपितु वृहद सांसों के लिए मारामारी क्या हमारी ! क्या तुम्हारी! सुविधाएं नहीं हैं परिश्रम ही सही है किसी का नहीं इंतजार विश्वास से है हमारा प्यार संभालेंगी हमें माँ धरती […]

कविता

संकोच

  किताबें खरिद तो ली उठाने का मन नहीं करता किस संकोच में आजकल पल-पल मरता वक्त की सुई आवाज़ लगाये टिक-टिक पन्नों की मासूमियत कहती अब तो लिख अब मोबाइल की स्क्रीन जैसे करती छलावरण बिल्कुल वैसे ही रहने लगा है आधुनिक जन शब्दों का गुबार दबा हुआ है कहीं सीने में लिखुंगा एक […]

कविता

जल

  जल ही जीवन है कहते कहते कंठ सूखा बर्बाद किया पल-पल हर रोज बुद्धि की बात न कर वो शून्य समान चाहे कितनी करले खोज बड़े घर महलों में बैठा तूँ जल संकट मैं चोखट में बैठा रोयेगा धन संपत्ति खाक होगी तूँ तन को निर्जल खोयेगा बहा दिया तुने देख कितना नहाने में […]

कविता

भुजंग

भुजंग लता पर चिपटा ला तो दो कोई चिमटा काट खायेगा जहरीला है देख इसका रंग नीला है आओ ! कोई सपेरे को बुलाओ अमरबेल है ,इसको समझाओ आकार इसका दूर से ही डरायेगा लता का ये ना कुछ कर पायेगा भुजंग से निपटे ,जिसको लता चाहिए क्या होता है,देखते हैं आप सब आईये  

कविता

आखिर

  सूखे हुए तने से जब निकलती है कोंपलें मौसम के मिजाज से बढ़ती है निकलते हैं ,हरे-हरे पत्ते फैल जाते हैं आसमान की ओर अपनी आवाजें बुलंद करते हैं हवा के साथ इतराते हैं ,इठलाते हैं जमीन को देखकर आवाज करते हैं ताकि अपनी मौजूदगी का एहसास करवा सकें पतझड़ आते ही पत्ते पीले […]