कविता

साथ-साथ

रास्ता लंबा था मगर हम चले थे साथ साथ आसान तो कुछ भी नहीं था शिकवे और गिले के साथ-साथ मुश्किलें थी बहुत कांटो भरी दोनों के पैरों में छाले थे साथ-साथ अरमानों का गुलदस्ता भी था ख्वाब भी हमने पा लेते साथ साथ ठहराव था ही नहीं कहीं सारे रास्ते पार किए थे साथ-साथ […]

कविता

शाम का ख्याल

इस शाम से मैं कुछ बातें करने के बाद अब अलग रहना चाहता हूं बस यही कहना चाहता हूं कि अगर मैं आज अकेला हूं तो ही मैं अलबेला हूं गज़ब आदमी होगा! जिसने भी धकेला हूं प्रपंचों से दूर ना कोई मालिक ना हुजूर! सारा का सारा दिन,सारी मेरी रात है तो मेरे लिए […]

कविता

कुछ तो है!

कुछ तो है! फलक पर चांद नहीं है हवाओं में कोई शोर नहीं कैसे उड़ा आखिर में वो बंधी उससे कोई डोर नहीं एक अजीब सी कशमकश उठी मन में धधकती आग लगी हो जैसे कहीं तन बदन में कुछ तो है! ये रास्ते भी अकेले हैं गली सुनसान नजर आती है आया एक झोंका […]

मुक्तक/दोहा

रख

सुन मुसीबतों के दौर में तू धैर्य की ढाल रख वो आएंगे वो जाएंगे अपना ह्रदय विशाल रख कर अपना रखरखाव जिंदगी के उतार-चढ़ाव हो मंजिल पर बस नजर ऐसा ये ख्याल रख युद्ध के लिए तैयार हो अपनी तीर कमान रख योद्धा सा हो जिगर तेरा अपने सारे सामान रख समर में कूदने से […]

कविता

हम

ना पाने की जिद्द ना खोने का ग़म इस सफर में अब ऐसे हो गये हैं हम ना उम्मीद किसी से ना अब कोई चाहत है अकेलापन साथी अपना खैर!अब तो राहत है ना मैं किसी का हुआ ना मेरी ही है अब कोई शुन्य के आगोश में मेरी आंखें खूब सोई ना मिलना किसी […]

कविता

कहानी

  कहानियों के किरदार सभी मेरा-तेरा करते हैं हम हैं दरबान इधर में क्या किसी से डरते हैं? रोज-रोज की उठापटक में सुझावों का कलेश हुआ नाम की खातिर देखो अब भाई-भाई में द्वेष हुआ अंहकार की कीमत होगी मौन का अपना मान सांसों के बदले सपने निकल न जायें प्राण अपना महत्व क्या बतलाना! […]

कविता

कुसूरवार

    कौन है? कुसूरवार! कहाँ जा रहे हम आँखों वाले अंधे कोई भी रास्ता पहचानता नहीं भीडभाड़ बहुत है यायावरों की मगर एक दूसरे को कोई जानता नहीं   किताबों में कुछ पन्ने रह गये हैं सभ्यता,संस्कृति के नाम पर ईमानदारी लकड़हारे तक सिमित है संवेदनहीन लड़ रहे जाम पर   दरार बहुत बड़ी […]

कविता

जीवन

जीवन संघर्ष है समर्पण है कैसे हैं हम दिखाता दर्पण है निरंतर चलता है कभी ना रुकता है आखिर में बस सामने मौत के झुकता है खट्टे मीठे फलों की साज बनाता है खुशी गम के गीतों की आवाज बनाता है डूबता सूरज है ये तो उगता सवेरा भी है अलग-अलग कहानी किरदार कभी मेरा […]

कविता

पहाड़ सी जिंदगी

  जिंदगी पहाड़ सी लग रही गरीबी के रोशनदान से कोशिश की उठने की बहुत कदम ठहर गये बेजान से जरूरतों को पुरा करते करते वक्त जाया हो रहा है मेरा लेखक कागज़ उठाये कहीं कोने में रो रहा है कब पार जाऊँगा इस बियाबान से जिंदगी पहाड़ सी लग रही गरीबी के रोशनदान से […]

कविता

दादाजी

ये बूढ़ा नहीं है ये बैठा है पिछले 9 दशक से एक वक्त था यह काम करता था अपनी जवानी की घोषणा सरेआम करता था इसने देखी है आजादी इसने कमाया है पसीने को ये रहा है खेत आता था पसीना खुद को भी और बैलों को भी ये चेहरा खुश हो जाता लहराती फसलों […]