सामाजिक

मैं कर नहीं दूंगा

दिन भर की भागा दौड़ी के बाद शाम को रमुआ अपने घर आया। उसका बेटा घेंघा बहुत सवाल पुछा करता था। रमुआ की पत्नी भाग्यमति अनपढ़ थी। वह दिन भर घर का काम करती रहती। घेंघा स्कूल से घर वापस आने के बाद अपना गृहकार्य कर रहा था। अपने स्वभाव के अनुसार उस दिन भी […]

कविता

वाह रे मानव

।‌ यहां मानव दानव बना बैठा है अपने ओछे संस्कारों से, कुचल डालता है उभरते हुनर को अपने अहंकारो से। करते नहीं थकते तारीफ ये चापलूस बड़े घरानों के, गाते हैं गीत वही जो पसंद आये बड़े चौकीदारों के। बेच दिये बचपन को हमने होटलों और दुकानों पर, अतिक्रमण का गिरे गाज फुटपाथ के ठेली […]

गीतिका/ग़ज़ल

हाय ये इश्क

उसकी चाहत में न जाने क्या – क्या कर बैठें। सुबह को शाम और रात को दिन समझ बैठे। आएगी वो पास मेरे इक ना इक दिन, आश हिबड़े में तब से लगाए बैठे थे।। उसके राहों में फूलों की घाटी बसा देते हम, हंस के कहती तो जां भी लूटा देते हम। रोज़ डे […]

कविता

क्या और कैसे सहते हैं

देखो दुनिया वालों हम, क्या और कैसे सहते हैं। हमारे भारत में, ऐसे भी लोग रहते हैं, करते हैं चोरी हमसे, और हमसे ऊंचे रहते हैं। रूख हवा जिधर का हो,ये उधर ही बहते रहते हैं देखो दुनिया वालों हम, क्या और कैसे सहते हैं। कभी जी हजूरी हमसे, कभी तो ये अकड़ते है, दुश्मन […]

कविता

योगी बाबा आये है

योगी बाबा आये है, बच्चों को समझाये है, नकल नहीं करना बाबू, कैमरा लगाए हैं। बहुत प्रसंशनीय कार्य पर बाबा यह ठीक नहीं, गर ऐसा करना था, वर्ष प्रारंभ में ही , शिक्षकों को भी रगड़ना था, पूरे साल राजनीति में, लगे रहे मेरे गुरूवर जी, आते दो दिन कालेज में, संध्या होती खैर पूछने […]

कविता

मेरी अभिलाषा

मेरी बस एक यही अभिलाषा है, इन भ्रष्टाचारियों की दुनिया में, ईमानदारी का पाठ पढ़ाऊंगा, मैं कुछ कर के दिखलाऊंगा, जो लोग असहाय लाचार हैं, ना कुछ करने को तैयार हैं, उनका आत्मविश्वास बढ़ा, मैं उनको शिक्षित बनाऊंगा, जो उम्मीदों को छोड़ें हैं, अपने सपनों को तोड़ें हैं, उनसे हुंकार भरवाऊंगा, हकीकत से रूबरू करवाऊंगा, […]

सामाजिक

भारत में दोहरी कानून व्यवस्था क्यों ?

जब हमारे भारतीय कानून व्यवस्था को शिक्षित समाज नहीं समझ पा रहा है, तो अनपढ़ व्यक्तियों का क्या होगा। भारत जैसे विकासशील, धर्मनिरपेक्ष देश में आखिर दो तरह के कानून व्यवस्था की क्या जरूरत। कल मेरे एक मित्र ने हनुमान प्रसाद जी के बारे में बड़ी – बड़ी बातें करने लगा। कहने लगा, आम तौर […]

कविता

।। दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो ।।

।। दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो ।। कभी गैस को जोड़ते हो, कभी पेट्रोल को जोड़ते हो, जोड़ने के चक्कर में क्यो लाचारो के सपने तोड़ते हो। आधार के लिए किसी का जीवनाधार छीनते हो, कैसे फंसे मेरे वोट जाल में नित नए राह ढूंढते हो। जनहित में जारी है इससे सबको […]

कविता

।। चुनाव में नेतागण ।।

।। चुनाव में नेतागण ।। घर-घर, जन – जन से अब मिलने लगे हैं। उठने वाले हाथ तुम्हारे सामने अब जुड़ने लगे हैं। अबकी चुनाव मैं कैसे भी जीत जाऊंगा तो बस करूंगा विकास कैसा, प्लान अब दिखाने में लगे हैं। यहां वोट हैं इतना, वहां हैं वोट उतना, जाति – धर्म की गणित लगाने […]

राजनीति सामाजिक

।। जनता है हम, तुम्हारी जागीर नहीं ।।

।। जनता है हम तुम्हारी जागीर नहीं ।। बहुत दिनों बाद एक दिन मेरी मुलाकात रमूआ से गांव के बाहर हो गई। एक – दूसरे से औपचारिक हाल – चाल पूछने के बाद मैंने उसके परिवार का हाल – चाल पूछा। रमूआ बचपन से लेकर अब तक, जब वह बीस वर्ष का हो चूका है। […]