भाषा-साहित्य

विश्व में भारत की पहचान – संस्कृत एवं हिन्दी

ओ३म् हमारे देश की वास्तविक पहचान क्या है?  विचार करने का हमें इसका एक यह उत्तर मिलता है कि संसार की प्राचीनतम भाषा संस्कृत व आधुनिक भारत की सबसे अधिक बोली व समझी जाने वाली भाषा आर्यभाषा-हिन्दी है। हिन्दी को एक प्रकार से संस्कृत की पुत्री कह सकते हैं। इसका कारण हिन्दी में संस्कृत के […]

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कहीं चलन न बन जाए रोमन लिपि में हिंदी का लिखा जाना

पिछले दिनों एक संगोष्ठी में जाना हुआ । एक प्रतिभागी का कहना था कि हिंदी को रोमन लिपि में लिखने से हमें परहेज नहीं करना चाहिए, बल्कि इसका स्वागत किया जाना चाहिए । उन्होंने तर्क भी दिए कि एसएमएस, कंप्यूटर, इंटरनेट में रोमन लिपि के सहारे हिंदी लिखने में आसानी होती है । इसलिए समय […]

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लघुकथा और भाषिक प्रयोग

भाषा मनुष्य का आत्मिक स्वरूप है, जिसके बिना उसके अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भाव, विचार, चिन्तन, कल्पना सबकी उड़ान भाषा से ही सम्भव है। इन सबकी अभिव्यक्ति ही उसे सामाजिक प्राणी बनाती है। यदि मानव के पास सम्प्रेषण का यह गुण न हुआ होता तो पूरी सृष्टि बेतरतीब होने के साथ-साथ […]

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पाक ग्रंथागार में संस्कृत-हिंदी की 8671 पांडुलिपि

धर्माचार्य और इतिहासवेत्ता जानते हैं कि पाकिस्तान के लाहौर शहर को भगवान राम के पुत्र लव ने बसाया था। वहां सनातन धर्मियों ने हजारों साल तक वैष्णव धर्म का झंडा फहराया। प्रमाण स्वरूप लाहौर के पंजाब विश्वविद्यालय में 8671 संस्कृत-हिंदी की पांडुलिपियां पुस्तकालय में आज भी सुरक्षित हैं। हालांकि यहां अरबी, फरसी, तुर्की, उर्दू और […]

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डॉ भवानी लाल भारतीय जी की साहित्य साधना

आर्यसमाज के इतिहास में डॉ भवानी लाल भारतीय जी ने अपनी लेखनी अपनी प्रतिभा के दम पर अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। भारतीय जी द्वारा 50 वर्षों से अधिक के लेखन काल में आर्यसमाज की अनेक पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख, 150 के करीब छोटी बड़ी पुस्तकों आदि का संपादन वह लेखन किया गया जिससे सम्पूर्ण […]

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सूर्य के ताप को स्याही बनाने वाले कवि : -राम धारी सिंह दिनकर

डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे. यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल. सब जन्म मुझी से पाते हैं,फिर लौट मुझी में आते हैं. बचपन में हिंदी के अपने पाठ्यक्रम […]

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कहानी साहित्य की – कविता जन जन से दूर क्यों ….

यह कहानी है या आलेख, मैं स्वयं समझ नहीं पारहा हूँ, सुनने पढ़ने वाले व विज्ञ साहित्यकार स्वयं निश्चय करें | कविता जन से क्यों दूर हुई है? …यूं तो भौतिकवादी जीवन की भागदौड़, बाजारवाद आदि तमाम कारण हैं परन्तुयह कहानी साहित्य की है |  आज साहित्य जगत में अज्ञान, भ्रम व प्रमाद व गुरुता […]

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बाल साहित्य लिखे बिना अधूरा है साहित्यकार’

वर्तमान संस्कृति ने सम्पूर्ण दुनिया की रुपरेखा ही बदल डाली है | आज के युग में सबके लिए सबकुछ उपलब्ध है | अगर नहीं है, तो सिर्फ  नन्हें-मुन्नों के पढने लायक कोई सामग्री | आज बच्चा जब स्कूली किताबों के अलावा कुछ पढना चाहता है तो उसके सामने एक सबसे बड़ी समस्या होती है कि […]

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विश्वमानव बसवेश्वर और आधुनिक युग : जमीन आसमां का अंतर

“ न करो चोरी, न करो हत्या न बोलो मिथ्या, न करो क्रोध न करो घृणा, न करो प्रशंसा अपनी न करो निंदा दूसरों की, यही है अंतरंग शुध्दि यही है बहिरंग शुध्दि ॥“१ महात्मा बसवेश्वर के इस वचन को पढते ही हम गहरी सोच में पड जाते हैं कि आज के इस आधुनिक युग […]

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स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक हिन्दी कविता

” हम सबके दामन पर दाग हम सबकी आत्मा में झूठ हम सबके माथे पर शर्म हम सबके हाथों में टूटी तलवारों की मूठ ॥ “ ये पंक्तियाँ धर्मवीर भारती जी की हैं जो स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक हिन्दी कविता की प्रवृत्ति को दर्शाती है। अब कविता हो या कोई भी साहित्य विधा वास्तविकता को ही अपना […]