नवीनतम लेख/रचना

  • यशोदानंदन-२०

    छः महीनों में ही श्रीकृष्ण घुटनों के बल मकोइया बन पूरे आंगन में विचरण करने लगे। चलते समय वे किलकारी मारना नहीं भूलते थे। भांति-भांति के मणियों से जड़ित समुज्ज्वल आंगन में अपने ही प्रतिबिंब को...



  • सितम

    सितम

    थक चुका हूं ए ज़िन्दगी तेरे सितम सहते सहते तेरी सुनते सुनते और अपनी कहते कहते यूँ सोचा न था कभी हँसी को भी तरसेंगे जो रहते थे कभी उन्मुक्त हवा में पंछी की तरह वो...

  • नारी …

    नारी …

    न मैं राधा हूँ न मैं मीरा न मैं सीता हूँ न मैं गांधारी न मैं लैला हूँ न मैं सोहनी न मैं देवी हूँ न मैं दासी मैं तो सिर्फ ईश्वर की रचना त्याग, प्रेम...


  • यशोदानंदन-१९

               श्रीकृष्ण ने अवतरण के प्रथम दिवस से ही अपनी अद्भुत बाललीला आरंभ कर दी थी। वे उन्हीं को अधिक सताते थे, जो उनका सर्वप्रिय था। मातु यशोदा जिसे एक शिशु का सामान्य व्यवहार समझती थीं,...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    तुम्हें ख़त लिख रहा हूँ लगी लत लिख रहा.हूँ दीवारें वालिदा को पिता छत लिख रहा हूँ बड़ों से झुक के मिलना लियाकत लिख रहा हूँ ये कत्लेआम दहशत कयामत लिख रहा हूँ मुहब्बत से ही...

  • उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 43)

    39. षडयंत्र की पहली चिंगारी कामक्रीड़ा से तृप्त बेसुध शहजादे को देवलदेवी ने झिंझोड़कर जगा दिया। शहजादा नींद में पागलों की तरह उठ बैठा, आँखें मलते हुए हड़बड़ाकर शय्या में एक तरफ दुबकते हुए बोला, ”क… क… कौन...

  • लोभ

    लोभ

    एक बार की बात है कि मैं बनारस जा रहा था। कर्मनाशा स्टेशन से देहरादून एक्सप्रेस पकड़कर मुगल सराय पहुँचते हैं। वहाँ पर गाड़ियां कुछ ज्यादा ही समय रूककर अपनी थकान मिटाती है। मैं गाड़ी से...

कविता